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आदिवासी समाज में पद गायन की परंपरा धार्मिक के साथ सामाजिक जागरूकता का माध्यम बन चुकी है।
भारत में पद रचना की परंपरा सदियों पुरानी है। कई रचनाकारों ने पदों के माध्यम से समाज में वैचारिक क्रांति की नींव रख धार्मिक भक्ति के साथ-साथ सामाजिक मूल्यों और कुरीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद की। इसी तरह आदिवासी समाज की पद गायकी परंपरा आज केवल धार्मिक आ
उसी पद परंपरा को काव्य में बदल कर आदिवासी समाज ने भी बीते 250 वर्षों से आत्मसात कर अपनी लोकभाषा में पद आधारित काव्य व साहित्य का सृजन किया है। इन रचनाओं के माध्यम से धर्म, आचरण और सामाजिक सुधार का संदेश जनमानस तक पहुंचाया गया। अब अन्य समाज और जातियों ने भी आयोजन शुरू कर दिए हैं।
सांस्कृतिक विस्तार और सामाजिक प्रभाव दौसा, टोंक, करौली, सवाई माधोपुर समेत कई जिलों में पद दंगल एक प्रमुख सांस्कृतिक गतिविधि बन चुका है। इनकी लोकप्रियता दिनोंदिन बढती जा रही है। सिर्फ आदिवासी समाज ही नहीं, बल्कि अन्य समुदायों ने भी पद दंगल परंपरा को अपनाकर आगे बढाया है।
शुरूआत में यह परंपरा 16 मात्रा, तीन ताल वाले शास्त्रीय संगीत पर आधारित रही, लेकिन बीते 120 वर्षों में शैली में बदलाव हुआ और पद गायन को अधिक सरल व प्रभावशाली बनाने के लिए “ढप” व “घेरे” जैसे लोक वाद्य यंत्रों का प्रयोग शुरू हुआ।
70 वर्षों से पद गायन कर रहे धवले राम मीणा लोकगायक धवले राम मीना बताते हैं कि वे बीते 70 वर्षों से पद दंगलों से जुड़े हुए हैं। 10 वर्ष की उम्र में उन्होंने मीराबाई और तुलसीदास के पद सुनकर पद गायन शुरू किया और 12 वर्ष की उम्र से रामायण व धार्मिक कथाओं पर आधारित प्रस्तुतियां देने लगे। इनका कहना है कि पद दंगल आज सिर्फ एक मंचीय गायन नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक विरासत है, जो समाज को जोड़ने, सुधारने और नई दिशा देने का कार्य कर रहा है।
राजनीतिक कथानकों की भी हुई एंट्री शुरूआत में पद दंगल केवल धार्मिक कथाओं तक सीमित थे, लेकिन पिछले दो दशकों में इनमें सामाजिक व राजनीतिक विषयों को भी शामिल किया जाने लगा है। अब पदों के माध्यम से भ्रष्टाचार, जातिगत भेदभाव, राजनीति में गिरावट जैसे मुद्दों को भी उठाया जाता है, जिन्हें लोग काफी रुचि से सुनते हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों के समावेश से युवाओं में भी इस परंपरा के प्रति रुचि बढ़ी है। अब युवा कलाकार न केवल गायन में भाग लेते हैं, बल्कि मंच संचालन और रचनात्मक लेखन भी करने लगे हैं।
रिपोर्ट: कमलेश असीका, लालसोट
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