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जल-जंगल-जमीन की रक्षा का उत्सव यानी गवरी रविवार को ठंडी राखी से शुरू हाे गया। यह अनुष्ठान 40 दिन चलेगा। शहर में पुलां व देबारी में गवरी ली गई। इसकी शुरुआत सुबह कपड़े पहनने की रस्म के साथ हुई। बंजारे का अभिनय करने वाले डालूलाल बताते हैं कि पुलां में 6

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इतिहासकार श्री कृष्ण जुगनू बताते हैं कि गवरी भील समाज का पारंपरिक लोकनृत्य है। इसके कलाकार शहर या गांव के चौक में गोला बनाकर बीच में गौरज्या मां (पार्वती) को स्थापित करते हैं। फिर थाली-मांदल की थाप पर गोल चक्र में घूम-घूम कर संवाद के साथ नृत्याभिनय करते हैं। इनमें समाज को जागरूकता का संदेश भी दिया जाता है। जैसे-गोमा के खेल से चोरी नहीं करने, राजा-रानी, वरजू कांजरी के खेल में पेड़ नहीं काटने, कालू कीर के खेल में जीव हत्या नहीं करने, भीलू राणा के खेल में बहादुरी से संकट का सामना करने, सेठजी के खेल में हमेशा खुश रहने, कान्हा-गुजरी के खेल में प्रेम का सुंदर चित्रण और राजा-रानी के खेल में नारीशक्ति-सम्मान का संदेश दिया जाता है।

  • सबसे पुराना मंचन – भील जाति दुनिया की सबसे पुरानी जातियों में से एक है। भील जाति और गवरी के कई प्रमाण अरावली की गुफाओं के शैल चित्रों में भी मिलते हैं। गौरज्या माता जो कि गौरी का रूप हैं, भील समाज इन्हें अपनी आराध्य मानता है। गवरी का सबसे पुराना खेल सेई के शिकार काे माना जाता है।
  • प्रमुख अभिनय – गवरी गजानंद आराधना से शुरू होती है। फिर भमरिया-भमरी, कालूकीर, बावजी महाराज, मां अंबे, नाहरसिंह और हनुमानजी का भी अभिनय होता है। गोमा चोर, कान्हा-गुजरी, दाणाजी (पुलिस), सेठजी की हंसी-मजाक, भीलू राणा बादशाह की सवारी व बंजारा के खेल के साथ समापन होता है।
  • कठिन नियम- गवरी सिर्फ एक नृत्याभिनय ही नहीं, कठिन तपस्या भी है। इसमें भाग लेने वाले कलाकार 40 दिन तक नहाते नहीं हैं। दिन में एक बार भोजन करते हैं। हरी सब्जी-मांस-मदिरा से दूर रहते हैं। नंगे पांव रहते हैं और सवा माह घर तक नहीं जाते। जमीन पर ही सोने जैसे कड़े नियमों का पालन करना पड़ता है।



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