जैसलमेर, मेवाड़ और बूंदी को मराठा साम्राज्य का हिस्सा दिखाने को लेकर राजस्थान में विवाद गहराता जा रहा है। नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग (NCERT) की आठवीं की सामजिक विज्ञान (सोशल साइंस) की किताब को लेकर अब राजस्थान के चार बड़े पूर्व राजघर
किताब में एक मैप प्रकाशित हुआ है, इसमें जैसलमेर, मेवाड़ और बूंदी समेत राजस्थान के कई हिस्सों को मराठा साम्राज्य का हिस्सा बताया गया है।
इस पर मेवाड़ के पूर्व राजघराने के सदस्य और भाजपा विधायक विश्वराज सिंह मेवाड़, उनकी पत्नी व राजसमंद से भाजपा सांसद महिमा कुमारी, जैसलमेर के पूर्व राजघराने के प्रमुख चैतन्यराज सिंह भाटी, बूंदी के पूर्व राजघराने के सदस्य ब्रिगेडियर भूपेश सिंह हाड़ा ने एनसीईआरटी के शिक्षाविदों पर हमला बोलते हुए कहा है कि यह पूर्वजों के बलिदान को धूमिल करने का प्रयास है। अलवर के पूर्व राजघराने के सदस्य भंवर जितेंद्र सिंह ने कहा- इतिहास को तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत करना चाहिए, न कि क्षेत्रीय या राजनीतिक एजेंडों के आधार पर।
पहले देखिए वह मैप, जो है विवाद की जड़

नक्शे में मराठा साम्राज्य को कोल्हापुरा से उत्तर में पेशावर और कटक तक दर्शाया है। इसमें जैसलमेर को भी मराठा साम्राज्य में दिखाया गया है।
क्या है विवाद:
- NCERT की किताब में प्रकाशित मानचित्र में मराठा साम्राज्य को कोल्हापुर से लेकर कटक और उत्तर में पेशावर तक फैला हुआ दिखाया गया है।
- इसमें जैसलमेर, मेवाड़, बूंदी, पंजाब सहित भारत के बड़े हिस्सों को मराठा अधीन बताया गया है।
- विरोध करने वालों का कहना है कि ऐतिहासिक प्रमाणों में कहीं भी इन रियासतों पर मराठा प्रभुत्व, कराधान या प्रशासनिक नियंत्रण का कोई प्रमाण नहीं है।

पढ़िए- किसने क्या कहा
1. भाजपा सांसद महिमा कुमारी और विधायक विश्वराज सिंह : दोनों ने एक जैसा ट्वीट कर कहा- पहले ब्रिटिश शासन के अंतर्गत गलत तरीके से पेश किया गया, अब मराठों के अधीन बताया जा रहा है। NCERT के शिक्षा विशेषज्ञों को कौन शिक्षित करेगा? क्या वे भारत के ऐतिहासिक तथ्यों को सही तरीके से प्रस्तुत करने में सक्षम हैं? इस पर गंभीर संदेह है।
2. चैतन्यराज सिंह भाटी : इस प्रकार की अपुष्ट और ऐतिहासिक साक्ष्य विहीन जानकारी न केवल NCERT जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि हमारे गौरवशाली इतिहास और जनभावनाओं को भी आघात पहुंचाती हैं। यह विषय केवल एक पाठ्यपुस्तक की गलती नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों के बलिदान, संप्रभुता और शौर्य गाथा को धूमिल करने का प्रयास प्रतीत होता है।
जैसलमेर रियासत के संदर्भ में उपलब्ध प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोतों में कहीं भी मराठा आधिपत्य, आक्रमण, कराधान या प्रभुत्व का कोई उल्लेख नहीं मिलता। इसके विपरीत, हमारी राजकीय पुस्तकों में भी स्पष्ट लिखा गया है कि जैसलमेर रियासत में मराठाओं का कभी भी, कोई दखल नहीं रहा।
3. ब्रिगेडियर भूपेश सिंह हाड़ा : बूंदी के पूर्व राजपरिवार सदस्य ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) भूपेश सिंह आपत्ति जता चुके हैं। उन्होंने 28 जुलाई को सोशल मीडिया पर लिखा था- हम मराठों के अधीन कभी नहीं थे। हमारे स्वाभिमान को मनगढ़ंत कहानियों से मत आहत कीजिए।
4. भंवर जितेंद्र सिंह : इतिहास को तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत करना चाहिए, न कि क्षेत्रीय या राजनीतिक एजेंडों के आधार पर। हिस्टॉरिकल फैक्ट है कि 18वीं सदी में राजस्थान की रियासतें – चाहे मारवाड़, मेवाड़, बीकानेर, जयपुर, भरतपुर, जैसलमेर, अलवर या अन्य… सभी अपनी स्वतंत्रता और स्वायत्तता बनाए रखने में सक्षम थीं।
ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि मराठों का राजस्थान में प्रभाव छापेमारी तक सीमित था। प्रभुत्व या विस्तार का तो सवाल ही नहीं उठता! इतिहास को धार्मिक या क्षेत्रीय आधार पर तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना तथ्यों को मिथक में बदल देता है। NCERT में की गई यह गलती राजस्थान के शूरवीर शासकों की वीरता, स्वतंत्रता, और सांस्कृतिक योगदान को कमजोर करने की कोशिश है।

जैसलमेर राजपरिवार के सदस्य, पूर्व महारावल चैतन्य राज सिंह।
चैतन्यराज सिंह ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पोस्ट टैग कर लिखा-

शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जी, संपूर्ण जैसलमेर परिवार की ओर से मैं आपका ध्यान इस ज्वलंत विषय की ओर आकृष्ट करना चाहता हूं कि NCERT द्वारा की गई इस प्रकार की त्रुटिपूर्ण, दुर्भावनापूर्ण और एजेंडा-प्रेरित प्रस्तुति को गंभीरता से लेते हुए तत्काल संशोधन करवाया जाए। यह केवल एक तथ्य संशोधन नहीं, बल्कि हमारी ऐतिहासिक गरिमा, आत्मसम्मान और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की सत्यनिष्ठा से जुड़ा विषय है। इस विषय पर त्वरित एवं ठोस कार्रवाई की अपेक्षा है।

मुगल भी जैसलमेर को नहीं जीत पाए थे
जैसलमेर के दर्ज इतिहास के अनुसार- मुगल भी जैसलमेर को नहीं जीत पाए थे। जैसलमेर की स्थापना भारतीय इतिहास के मध्यकाल के प्रारंभ में साल 1178 के लगभग यदुवंशी भाटी के वंशज रावल-जैसल ने की थी।
रावल जैसल के वंशजों ने यहां भारत के गणतंत्र में परिवर्तन होने तक बिना वंश क्रम को भंग किए हुए 770 साल तक सतत शासन किया, जो अपने आप में एक महत्वपूर्ण घटना है। जैसलमेर राज्य ने भारत के इतिहास के कई काल को देखा व सहा है। यह राज्य मुगल साम्राज्य में भी लगभग 300 वर्षों तक अपने अस्तित्व को बनाए रखने में सफल रहा।
जैसलमेर शहर पर खिलजी, राठौर, मुगल, तुगलक आदि ने कई बार आक्रमण किया था। लेकिन वे कभी इसे जीत नहीं पाए। भाटियों के इतिहास का यह संपूर्ण काल सत्ता के लिए संघर्ष का काल नहीं था। वरन अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष था, जिसमें ये लोग सफल रहे। भारत में अंग्रेजी राज्य की स्थापना से लेकर समाप्ति तक भी इस राज्य ने अपने वंश गौरव व महत्व को यथावत रखा।
भारत की स्वतंत्रता के बाद यह भारतीय गणतंत्र में विलीन हो गया। भारतीय गणतंत्र के विलीनीकरण के समय इसका भौगोलिक क्षेत्रफल 16,062 वर्ग मील के विस्तृत भू-भाग पर फैला हुआ था।

जैसलमेर सोनार दुर्ग। (फाइल फोटो)
सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस सोशल मीडिया पर इस आपत्ति के बाद बहस छिड़ी है। कई यूजर्स ने इस आपत्ति का समर्थन किया है तो कई ने मराठा के पक्ष में अपनी बात कही है। इस बीच सोशल मीडिया पर एक मैप डालकर दावा किया कि यह ग्वालियर में सिंधिया पूर्व राजपरिवार के म्यूजियम में है।

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