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नवरात्रा नजदीक हैं, लेकिन श्री वीर हनुमानजी सामोद मंदिर के हजारों श्रद्धालु इस बार भी 750 सीढ़ियां चढ़कर ही दर्शन करेंगे। वजह सिर्फ यह है कि मात्र 1 हेक्टेयर जमीन को लेकर बना रोप-वे बीते वर्षों से सरकारी दफ्तरों की फाइलों में धूल खा रहा है।
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए 2014 में रोप-वे का प्लान बना, 2016 में काम शुरू हुआ और 2019 में बिना अनुमति संचालन भी कर दिया गया। तत्कालीन कलेक्टर जगरूप सिंह यादव ने सुरक्षा कारणों से इसे 28 जून 2019 को बंद करा दिया। तब पता चला कि रोप-वे का बेस वन विभाग की 1 हेक्टेयर जमीन पर खड़ा कर दिया गया। इसके बाद से यह धार्मिक परियोजना विवादों और विभागीय टालमटोल का शिकार हो गई।
वन विभाग को 5 साल बाद ‘याद’ आई जमीन; मंदिर ट्रस्ट ने 2015 में कोलकाता की कंपनी सीआरएसपीएल से अनुबंध किया। निर्माण के पांच साल बाद वन विभाग को पता चला कि उसकी 0.2695 हेक्टेयर जमीन पर रोप-वे खड़ा है। इसके बाद आपत्ति दर्ज कराई गई और मामला वन भूमि डायवर्जन तथा अनुमति संबंधी उलझनों में फंस गया।
6 साल में भी नहीं सुलझा विवादः वन अधिकार अधिनियम, 2006 और नियम 2012 के तहत एफआरए प्रमाणपत्र तो जारी हो गया, परंतु शर्त यह रखी गई कि । हेक्टेयर गैर-वन भूमि ट्रांसफर करनी होगी। यह शर्त आज तक पूरी नहीं हुई। नतीजा यह है कि 364 मीटर लंबा, 162 मीटर ऊंचा और तीन ट्रॉलियों वाला रोपवे तैयार होने के बावजूद बेकार खड़ा है।
प्रशासनिक दिलाई से श्रद्धालु परेशान, प्रशासन की बेरुखी और विभागीय खींचतान ने इस परियोजना को ठप कर रखा है। लाखों श्रद्धालु 10 साल से रोपवे का इंतजार कर रहे हैं।
रोप-वे का मामला वन विभाग के पास विचाराधीन है। -संतोष कुमार मीणा, एडीएम साउथ
भारत सरकार की प्राथमिक स्वीकृति में कुछ शर्तें हैं, जिन्हें पूरा करने को कहा गया है। -देवेंद्र प्रताप जागावत, उप वन संरक्षक, जयपुर
वीर हनुमानजी मंदिर की 100 बीघा से ज्यादा जमीन पहले ही वन विभाग ले चुका है। जहां रोप-वे बना है, वह जमीन भी मंदिर की ही थी। – महंत अवध बिहारी, श्री वीर हनुमानजी सामोद
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