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राजस्थान की सीतामाता सेंचुरी (चित्तौड़गढ़) में नेफिला पिलिप्स नाम की दुर्लभ मकड़ी नजर आई है। वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट ने इस मकड़ी को जाला बुनते अपने कैमरे में कैद किया है। एक्सपर्ट का दावा है इस मकड़ी का जाल स्टील से भी 5 गुना मजबूत होता है। एक्सपर्ट बताते है

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वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट डॉ. सुनील दुबे ने इस स्पाइडर का वीडियो बनाया है। दुबे कहते हैं- वीडियो में मकड़ी इतनी बारीकी और खूबसूरती से अपने धागे बुनती हुई नजर आई कि ऐसा लगा मानो कोई टेलर सिलाई कर रहा हो। हर रेशे की दिशा, हर घुमाव एक सटीक गणना की तरह दिखा कि कुदरत की यह बेजोड़ कारीगरी देखने वालों को हैरान कर गई। इसी खासियत के कारण इस मकड़ी को प्रकृति की बायो इंजीनियर भी कहा है।

पहले देखिए गोल्डन सिल्क स्पाइडर की तस्वीर…

स्टील से भी मजबूत रेशम, जानिए क्यों?

वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ सुनील दुबे ने बताया कि गोल्डन सिल्क ऑर्ब-वीवर मकड़ी का रेशम स्टील से पांच गुना ज्यादा मजबूत होता है और इसमें लचीलापन की अद्भुत क्षमता होती है, जिससे यह चिकित्सा, रक्षा और वस्त्र जैसे क्षेत्रों में कई अनुप्रयोगों में यूज किया जा सकता है।

उन्होंने बताया –

गोल्डन सिल्क ऑर्ब-वीवर मकड़ी का रेशम खास तरह के प्रोटीन से बना होता है। इन प्रोटीनों की संरचना ऐसी होती है कि इसमें दो हिस्से होते हैं –

  • ग्लाइसिन वाला हिस्सा, जो रेशम को लचीला (खिंचने योग्य) बनाता है, और
  • एलानिन वाला हिस्सा, जो रेशम को मजबूत बनाता है।
  • जब मकड़ी इस रेशम को खींचती है, तो ये प्रोटीन एक दिशा में सही तरीके से जुड़ जाते हैं, जिससे उनके बीच और मजबूत बंधन बनते हैं।
  • इसी कारण यह रेशम स्टील से भी ज़्यादा मजबूत और लचीला होता है, जबकि इसका वजन बहुत हल्का होता है।

नेफिला पिलिप्स

सीतामाता सेंचुरी के सहायक वन संरक्षक (ACF) राम मोहन मीणा ने बताया –

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इस मकड़ी को वैज्ञानिक भाषा में नेफिला पिलिप्स कहा जाता है। इसे आमतौर पर गोल्डन सिल्क ऑर्ब-वीवर या जायंट वुड स्पाइडर भी कहा जाता है। यह भारत में पाई जाने वाली सबसे बड़ी मकड़ियों में से एक है। इसका नाम इसके द्वारा बुने गए सुनहरे रंग के रेशमी जाले के कारण पड़ा है।

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बता दे कि यह मकड़ी नेफिला वंश से संबंधित है, जो अपने प्रभावशाली और मजबूत जालों के लिए विश्वभर में जानी जाती हैं।

​​​​​​सूरज की किरणों से सोने जैसा चमकता है जाल

गोल्डन सिल्क ऑर्ब-वीवर मकड़ी का रेशम बेहद चमकदार भी होता है, और सूरज की रोशनी में यह सोने की तरह चमकता है। इस मकड़ी के रेशम में ऐसे प्राकृतिक तत्व होते हैं, जो रोशनी को चेंज कर उसे सुनहरी चमक देते हैं। यही वजह है कि इसका जाल देखने में मानो किसी कलाकार का सुनहरा डिजाइन लगता है।

नर होता हैं छोटा – मादा होती हैं बड़ी

ACF राम मोहन मीणा ने बताया- इस प्रजाति में मादा मकड़ी आकार में काफी बड़ी होती है, जो लगभग 4 सेंटीमीटर तक, जबकि नर केवल 6 मिलीमीटर तक का होता है।

यह आकार में फर्क इतना ज्यादा होता है कि कभी-कभी दोनों को देखकर लगता ही नहीं कि ये एक ही प्रजाति हैं। मादा के शरीर पर पीले, भूरे और काले रंग के निशान होते हैं, जबकि पैरों पर पीली और भूरे रंग की धारियां बनी होती हैं। ये रंग न केवल सुंदरता बढ़ाते हैं, बल्कि जंगल के माहौल में इसे शिकारियों से छिपने में भी मदद करते हैं।

जाल में फंसने वाले कीट हैं इसका भोजन

ACF राम मोहन मीणा ने बताया- गोल्डन सिल्क मकड़ी मुख्य रूप से मच्छर, पतंगे, मधुमक्खियां और मक्खियां जैसे कीट खाती है। जब कोई कीट इसके जाल में फंसता है, तो यह तुरंत उसे अपने विष से निष्क्रिय कर देती है और बाद में धीरे-धीरे खाती है। ये मकड़ियां दिन और रात दोनों समय सक्रिय रहती हैं और आमतौर पर शुष्क जंगलों, झाड़ियों और रेतीले इलाकों में पाई जाती हैं।

जंगल के लिए बहुत उपयोगी होती है मकड़ी

ACF राम मोहन मीणा ने बताया- गोल्डन सिल्क ऑर्ब-वीवर मकड़ी इंसानों के लिए खतरनाक नहीं है। यह बहुत शर्मीली और शांत स्वभाव की होती है। अगर गलती से यह काट भी ले तो इसका असर केवल हल्की जलन या सूजन तक सीमित रहता है। इसके बावजूद, यह जंगल के लिए बहुत उपयोगी है क्योंकि यह हानिकारक कीटों को खाकर प्राकृतिक संतुलन बनाए रखती है।



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