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चंदन गोयरा (गोह) या ‘बिजली गोयरा’ नाम सुनते ही लोगों में सिहरन दौड़ जाती है। इसकी बनावट और लपलपाती जीभ को लेकर ग्रामीण इलाकों में धारणा है कि अगर यह जीव (गोह) किसी को काट ले, तो वह पानी तक नहीं मांगता, तुरंत मौत हो जाती है।

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गोयरे को एक्सपर्ट मॉनिटर लिजार्ड के नाम से संबोधित करते हैं। भास्कर ने इन लिजार्ड से जुड़ी भ्रांतियों को लेकर वन-विभाग के एक्सपर्ट और एनिमल डॉक्टर से बात की।

गोयरे में न तो जहर होता है न ही इसके काटने से किसी की मौत होती है।

ये साबित करने के लिए एक्सपर्ट (रेंजर) ने इससे खुद को कटवाया, इसका वीडियो डाला और लोगों को जागरूक किया।

एक्सपर्ट बताते हैं- इनके नाखून बेहद तेज होते हैं, वयस्क गोयरा करीब 1 क्विंटल का वजन खींच सकता है। इतिहासकार कहते हैं- शिवाजी के सेनापति तानाजी मालसुरे गोयरे का उपयोग किले की दीवारों में चढ़ने के लिए करते थे।

पढ़िए, रेप्टाइल (सरीसृप) प्रजाति के गोयरे से जुड़े मिथक के पीछे की सच्चाई…

पहले देखिए शर्मीले और रहस्यमयी जीव की तस्वीर

पहला मिथक: इसके काटने से मौत!

सीतामाता सेंचुरी के धरियावद रेंजर प्रशांत शर्मा कहते हैं –

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ये सब महज अफवाहें हैं। हमारे पास ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि इस जीव का काटना जानलेवा हो। इसके ना तो जहर वाले दांत होते हैं और न ही विष ग्रंथि। हमने इसे कई बार हाथों में लिया है, कुछ दिन पहले एक वीडियो भी बनाया था जिसमें मैंने इसे खुद से कटवा कर दिखाया। आज भी मैं बिल्कुल स्वस्थ हूं।

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वीडियो बना कर दिया जागरूकता का संदेश

प्रशांत शर्मा का वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में रहा। उन्होंने यह वीडियो लोगों को जागरूक करने के मकसद से बनाया था। उन्होंने बताया कि यह गोयरा चार साल का था, और जब उसने उन्हें काटा, तब भी न कोई सूजन हुई और न ही कोई विष प्रभाव।

उनका साफ संदेश था – “कभी भी किसी वन्यजीव को अंधविश्वास के चलते न मारें।”

गोयरा है एक शर्मीला और पर्यावरण हितैषी जीव

मॉनिटर लिजर्ड यानी गोयरा एक बेहद शांत और शर्मीला जीव होता है। आमतौर पर यह छोटे पत्थरों, चट्टानों या जमीन में खुदे बिलों में रहता है। ये खुद के बिल बनाते हैं या दूसरों के बिलों में भी रह सकते हैं।

बारिश के समय जब बिलों में पानी भर जाता है, तो ये जीव रिहायशी इलाकों में दिखने लगते हैं। रेंजर शर्मा कहते हैं –

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लोग डर जाते हैं, हमें फोन आते हैं कि कुछ करिए। लेकिन असल में वह जीव इंसानों से बचने की कोशिश कर रहा होता है। यह हमला नहीं करता, सिर्फ अपना बचाव करता है।

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तस्वीर वन-विभाग के रेंजर शर्मा की है। उन्होंने गोह को अपने हाथों पर रख दिखाया कि इससे कोई ख़तरा नहीं…

तस्वीर वन-विभाग के रेंजर शर्मा की है। उन्होंने गोह को अपने हाथों पर रख दिखाया कि इससे कोई ख़तरा नहीं…

दूसरा मिथक: यह जहरीला, आक्रामक

वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. धर्मेंद्र कुमार सोन भी इस बात की पुष्टि करते हैं। उनका कहना है –

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गोयरा के काटने से मौत नहीं होती। हां, अगर किसी को स्किन इन्फेक्शन की दिक्कत है तो मामूली सूजन या एलर्जी हो सकती है, लेकिन यह ज़हर के कारण नहीं, बल्कि जीव की त्वचा या स्किन पर मौजूद बैक्टीरिया के कारण होता है। ये इंसानों को देखकर डर जाता है। गोयरा भी अन्य जीव जंतु की तरह ही इकोसिस्टम के लिए जरूरी होता है।

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तानाजी और ‘यशवंती’ की ऐतिहासिक कहानी

इस सरिसृप की उपयोगिता और मजबूती को लेकर एक ऐतिहासिक किस्सा भी काफी मशहूर है।

छत्रपति शिवाजी महाराज के सेनापति तानाजी मालुसरे के पास एक ‘गोह’ थी, जिसका नाम ‘यशवंती’ था। तानाजी दुर्ग पर चढ़ाई करते समय इसकी कमर में रस्सी बांधकर किले की दीवार पर फेंकते थे। यह जीव दीवार पर चिपक जाता और रस्सी के सहारे सैनिक दीवार पर चढ़ जाते थे।

रेंजर प्रशांत ने गोह से खुद को कटवाया ताकि इसके जहरीले होने की भ्रान्ति दूर हो सके।

रेंजर प्रशांत ने गोह से खुद को कटवाया ताकि इसके जहरीले होने की भ्रान्ति दूर हो सके।

रेंजर शर्मा कहते हैं –

“इनके नाखून इतने मजबूत होते हैं कि ये 1 क्विंटल तक का वजन खींच सकते हैं। इनका दीवार पकड़ने का तरीका अविश्वसनीय रूप से मज़बूत होता है।”

गोयरा का जीवन चक्र और आदतें

मॉनिटर लिजर्ड की औसतन उम्र 10 से 15 साल तक होती है। ये जीव गर्मियों में, खासकर बरसात के बाद 10 से 30 अंडे देते हैं। ये अंडे पत्तों के ढेर में या जमीन में गड्ढा बनाकर छिपा दिए जाते हैं। अंडे भूरे या सफेद रंग के होते हैं और 3 से 5 सेमी लंबे होते हैं।

बच्चे कुछ हफ्तों तक मां के साथ रहते हैं, फिर वे स्वतंत्र हो जाते हैं। इनका शरीर हल्के भूरे रंग का होता है, जिस पर काले धब्बे होते हैं। त्वचा मोटी होती है और नाखून बेहद तेज।

इनकी लंबाई भारत में 5 से 6 फीट तक पाई जाती है। भोजन की बात करें तो ये जीव कीड़े-मकोड़े, छोटे जानवर, पक्षियों के अंडे और सड़ा हुआ मांस खाते हैं।

एक बंदर की मौत से उपजी प्रेरणा

रेंजर शर्मा ने बताया कि जागरूकता के ये वीडियो बनाने की प्रेरणा एक हादसे से मिली।

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हम आरामपुरा गेस्ट हाउस में बैठे थे, तभी बाहर जोर की आवाज आई। देखा तो एक कार से टकराकर एक बंदर की मौत हो गई थी। पता चला कि बाहर से आए पर्यटक उन्हें खाना खिला देते हैं, जिससे बंदरों की आदत बिगड़ जाती है। वे हर गाड़ी के पीछे दौड़ते हैं और हादसे होते हैं।

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यही सोचकर शर्मा ने पहले बंदरों को लेकर वीडियो बनाया था, जिसे काफी सराहना मिली। फिर उन्होंने गोयरा पर वीडियो बना कर वन्यजीवों के प्रति समझ और संवेदनशीलता बढ़ाने की कोशिश की।

अंधविश्वास नहीं, जानकारी जरूरी है

एक तरफ हम विज्ञान और तकनीक में चांद तक पहुंच गए हैं, वहीं दूसरी तरफ अभी भी कुछ जीवों को लेकर मिथक और डर हमारे मन में बैठे हैं। गोयरा एक ऐसी ही गलतफहमियों से घिरा जीव है। जबकि सच्चाई ये है कि मॉनिटर लिजर्ड न तो जहरीली होती है, न जानलेवा और न ही हमला करने वाली। जरूरत है सही जानकारी, वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता की और प्राकृतिक संतुलन को समझने की।

अफवाहों से भरा नाम – ‘चंदन गोयरा’ या ‘बिजली गोयरा’

ग्रामीण क्षेत्रों में इसे कई नामों से जाना जाता है – चंदन गोयरा, बिजली गोयरा, गोह, घ्योरा, विषखोपड़ा आदि। इनमें से हर नाम अपने साथ कोई न कोई डरावनी कहानी या मिथक जोड़कर पेश किया गया है। कुछ लोग इसे ऐसा प्राणी मानते हैं जिस पर बिजली गिरती है, इसलिए इसका एक नाम ‘बिजली गोयरा’ भी प्रचलित है।



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