राजस्थान विधानसभा के चल रहे सत्र में गुरुवार को शिव विधायक रविन्द्र सिंह भाटी ने कई गंभीर और जनहित से जुड़े मुद्दे उठाकर सदन का ध्यान खींचा। भाटी ने न केवल खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की कमियों पर सवाल खड़े किए बल्कि प्रवासी राजस्थानियों की समस्याओं और श्
भाटी ने सबसे पहले राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 की धारा 29 के तहत गठित सतर्कता समितियों के संचालन पर सवाल उठाते हुए कहा- इन समितियों की अध्यक्षता अधिकारियों को सौंप देने से उनका स्वरूप औपचारिकता तक सीमित रह गया है। बाड़मेर जैसे विशाल जिले में कलेक्टर 84 समितियों के अध्यक्ष या सदस्य हैं। जिन पर पहले से ही प्रशासनिक, न्यायिक और योजनागत जिम्मेदारियों का भारी बोझ है। उन्होंने कहा-

गरीब और BPL परिवारों को समय पर पूरा राशन नहीं मिल रहा। जनता की शिकायतें सुनना जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है। इसलिए समितियों की अध्यक्षता का अधिकार निर्वाचित प्रतिनिधियों को दिया जाना चाहिए।


रविंद्र सिंह भाटी ने मीडिया बातचीत प्रवासी राजस्थान का मुद्दा उठाया।
प्रवासी राजस्थान सांस्कृतिक धरोहर और परंपरा के असली सारथी
भाटी ने विधानसभा प्रांगण में पत्रकारों से बात करते हुए प्रवासी राजस्थानियों की समस्याओं का मुद्दा उठाया। कहा – प्रवासी भाई-बहन केवल रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में नहीं जाते, बल्कि वे राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर और परंपरा के असली सारथी हैं। आज करोड़ों की संख्या में लोग राज्य से बाहर काम कर रहे है।
प्रवासी समुदाय अपने श्रम, कौशल और मूल्यों से न केवल अपने परिवार बल्कि अपने गृह राज्य की अर्थव्यवस्था को सहारा देता है। लेकिन हाल के वर्षों में तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में प्रवासियों को भाषाई और सांस्कृतिक भेदभाव, हिंसा और सामाजिक अलगाव का सामना करना पड़ रहा है। यह संविधान की मूल भावना समानता और भाईचारे के खिलाफ है। सरकार इस पर तत्काल हस्तक्षेप करे और सुरक्षा के उपाय करे।
मजदूरों का मजदूरी समय बढ़ना संवैधानिक अधिकारों का हनन
सत्र के दौरान भाटी ने राजस्थान कारखाना संशोधन विधेयक 2025 का भी कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा- मजदूरों की कार्यावधि बढ़ाकर 10 घंटे करना न केवल संवैधानिक अधिकारों का हनन है बल्कि सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार इसे बलात श्रम की श्रेणी में भी रखा जा सकता है। उन्होंने कहा-

यह संशोधन अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानकों का उल्लंघन करता है और श्रमिकों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और पारिवारिक जीवन पर गहरा नकारात्मक असर डालेगा। महिलाओं को नाइट शिफ्ट में काम करने की अनुमति देना “नारी सशक्तिकरण” नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा और गरिमा के साथ समझौता है।

पश्चिमी राजस्थान के कठिन भूगोल में काम करने वाले श्रमिक पहले से ही असुरक्षा और कम वेतन जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं, और यह विधेयक उनकी हालत और बदतर बना देगा। सरकार अगर मजदूरों के संवैधानिक और मानवीय अधिकारों की रक्षा नहीं करती, तो यह लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था की आत्मा पर सीधा आघात होगा।
उन्होंने कहा- लोकतांत्रिक व्यवस्था का सार तभी जीवित रह सकता है जब जनता की आवाज़ को प्राथमिकता दी जाए, प्रवासियों को भेदभाव से मुक्त वातावरण मिले और श्रमिकों के हितों को संरक्षित रखा जाए। सरकार समितियों की संरचना में सुधार करे, प्रवासी समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करे और कारखाना संशोधन विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस ले।
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