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प्रेस वार्ता के दौरान महा बहिष्कार आंदोलन की जानकारी देते पदाधिकारी
भीलवाड़ा में विमुक्त घुमंतू एवं अर्द्ध घुमंतु समाज (डीएनटी) द्वारा महा बहिष्कार आंदोलन 1 अगस्त को आजाद चौक में किया जाएगा।
राष्ट्रीय पशुपालक संघ एवं डीएनटी संघर्ष समिति के अध्यक्ष लालजी राईका ने बताया कि इन समाजों के विकास के लिए सरकार से 10 प्रमुख मांगें की गई हैं, जो रेनके आयोग और इदाते आयोग की सिफारिशों के आधार पर तय की गई हैं।
राजस्थान में वर्तमान में सरकारी सूची में लगभग 32 डीएनटी समाज शामिल हैं, जबकि वास्तविक संख्या 50 से अधिक है। इनकी अनुमानित जनसंख्या करीब 1.23 करोड़ है, जो राज्य की कुल जनसंख्या का 15% है। बावजूद इसके, इन समाजों को आजादी के 75 वर्षों बाद भी प्रशासन, राजनीति, शिक्षा और व्यवसाय में कोई प्रभावी भागीदारी नहीं मिली है।
आवास और पट्टों की मांग
राईका ने बताया कि इन समाजों के पास आवास नहीं है, और जिनके पास हैं भी, उन्हें पट्टे नहीं मिले हैं। बच्चों की शिक्षा के लिए कोई विशेष योजना या सुविधा नहीं है। वर्तमान आरक्षण व्यवस्था में इन्हें अन्य समाजों के साथ जोड़ दिया गया है, जबकि सुप्रीम कोर्ट और आयोगों की सिफारिशों के अनुसार इनका आरक्षण में उप वर्गीकरण किया जाना चाहिए।
विमुक्त, घुमंतू, अर्ध-घुमंतू जाति परिषद के प्रदेशाध्यक्ष रतन नाथ कालबेलिया ने बताया कि इस आंदोलन को बहिष्कार नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि जातिगत विसंगतियों के कारण कई समाज अभी भी डीएनटी की सूची से बाहर हैं। राईका और देवासी को रेबारी की तरह शामिल नहीं किया गया। जोगी और कालबेलिया को एक माना गया जबकि वे भिन्न समाज हैं।
बोले- लोग योजनाओं से वंचित हैं
राईका ने बताया कि प्रमाण पत्र जारी नहीं हो पा रहे, जिससे बड़ी संख्या में लोग सरकारी योजनाओं से वंचित हैं।
अलग से आरक्षण नहीं दिया गया और वर्तमान आरक्षण प्रणाली इनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति के अनुकूल नहीं है।
70% लोग गोचर और वन भूमि पर रहते हैं, लेकिन पट्टों की सुविधा सिर्फ आबादी भूमि तक सीमित है।
शिक्षा के लिए कोई विशेष सुविधा नहीं है, न ही छात्रवृत्ति या आवासीय विद्यालय जैसी योजनाएं।
आंदोलन करने की बात कही
राईका ने बताया कि इन सभी कारणों से समाज अब मौजूदा व्यवस्था का बहिष्कार करेगा। यदि इस आंदोलन के बाद भी सरकार ने इन मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो आंदोलन को गांव-गांव तक फैलाया जाएगा। यह बहिष्कार कोई विरोध नहीं, बल्कि सकारात्मक चेतावनी है कि यदि सरकार हमारी प्रकृति, जीवनशैली और सामाजिक स्थिति को समझकर समावेशी नीतियां नहीं बनाती, तो समाज मौजूदा सिस्टम को अस्वीकार करेगा। यह सरकार को जगाने का एक शांतिपूर्ण, लेकिन गंभीर संदेश है।
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