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मानसून की विदाई के साथ ही मौसमी बीमारियों की बाढ़ आ गई है। अस्पतालों के आउटडोर में भीड़ बढ़ गई है। वायरल फीवर, डेंगू, मलेरिया और स्क्रब टायफस के केस आ रहे हैं।

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डेंगू के वायरस का ट्रेंड फिर बदला है। ऐसे में माना जा रहा है कि इस बार डेंगू के मरीजों की संख्या में ज्यादा इजाफा नहीं होगा। लेकिन चिंता की बात ये है कि स्क्रब टायफस के मरीज बढ़ रहे हैं।

राजस्थान में अब तक ढाई हजार से ज्यादा मरीज सामने आ चुके हैं। ज्यादातर को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। इलाज में देरी गंभीर साबित हो सकती है। इसलिए इसे साइलेंट किलर भी मानते हैं।

एसएमएस अस्पताल में लगी मरीजों की कतार। ज्यादातर मौसमी बीमारियों से पीड़ित हैं।

एसएमएस अस्पताल में लगी मरीजों की कतार। ज्यादातर मौसमी बीमारियों से पीड़ित हैं।

निमोनिया के साथ आ रहे स्क्रब टायफस के मरीज

डॉक्टर्स के अनुसार स्क्रब टायफस के डेली 8-10 मरीज सामने आ रहे हैं। इनमें ज्यादातर को अस्पताल में भर्ती करना पड़ रहा है।

डॉ.एमके अग्रवाल ने बताया कि इस बार स्क्रब टायफस के मरीज शुरुआती तौर पर ही गंभीर लक्षणों के साथ अस्पताल पहुंच रहे हैं। इनमें निमोनिया, फेफड़ों के संक्रमण वाले ज्यादा हैं।

मरीजों को सांस लेने में परेशानी है। समय पर इलाज न शुरू हो तो मरीज की मौत तक हो सकती है। ऐसे मरीजों को 7-8 दिन ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखना पड़ रहा है।

अलवर, बहरोड़, दौसा क्षेत्र से ज्यादा मरीज

जयपुर एसएमएस हॉस्पिटल में सबसे ज्यादा केस अलवर, बहरोड़, कोटपूतली, दौसा एरिया से आ रहे हैं।

ग्रामीण इलाकों या जहां खेतों में ज्यादा काम होता है, घास में घूमने वाले लोग स्क्रब टायफस का जल्द शिकार होते हैं। स्क्रब टायफस के लक्षण चार से पांच दिन बाद दिखने लगते हैं। सप्ताह भर में अगर इलाज न हो तो स्थिति गंभीर हो सकती है।

स्क्रब टायफस रिकेटेशिया बैक्टीरिया ग्रसित माइट (कीट) की वजह से होता है। घर के आसपास किसी गार्डन के अंदर लग रही घास, खेतों में लगी झाड़ियों एवं खरगोश, चूहे व गिलहरियों जैसे अन्य जानवरों को यह प्रभावित करता है।

मल्टी ऑर्गन फेल्योर स्टेज खतरनाक

डॉक्टर अग्रवाल ने बताया कि स्क्रब टायफस के आम लक्षण हैं- बुखार और सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, शरीर पर दाने होना। स्थिति गंभीर होने पर बेहोशी आ जाती है। प्लेटलेट्स गिर जाती हैं।

समय पर इलाज न होने के चलते यह फेफड़ों पर असर डालना शुरू करता है। बीमारी की सबसे घातक स्टेज मल्टीपल ऑर्गन फेल्योर होती है, जिसमें मरीज की मौत तक हो जाती है।

हर साल पैटर्न चेंज करता है डेंगू का वायरस

डॉक्टर्स का कहना है कि डेंगू का वायरस हर साल पैटर्न चेंज करता है। अलग-अलग जिलों में अलग-अलग वेरिएशन हो सकता है। प्रदेश स्तर पर बात करें तो एक साल में डेंगू के केसेज में अचानक बढ़ोतरी होती है। इसके बाद दूसरे साल केसेज की संख्या कम होती है।

वायरस म्यूटेशन और इम्यूनिटी की वजह से ट्रेंड बदल रहा

एसएमएस अस्पताल के एमडी डॉ.विशाल गुप्ता ने बताया कि हर साल डेंगू के मरीजों की संख्या में उतार-चढाव देखने को मिलता है। इसका बड़ा कारण है डेंगू किसी साल कहर बरपाता है और उसके वायरस का म्यूटेशन नहीं होता है।

यानी वायरस के प्रकार में कोई बदलाव नहीं होता है। ऐसे में उसके प्रति लोगों की इम्यूनिटी मजबूत हो जाती है। जिसके चलते मरीजों की संख्या में कमी देखने को मिलती है और वायरस का उतना असर नहीं रहता।

वहीं, समय बीतने के साथ ही इम्यूनिटी भी कमजोर होती है और वायरल में बदलाव भी हो जाता है। ऐसे में फिर एकाएक मरीजों की संख्या बढ़ती है। डेंगू में अचानक से प्लेटलेट्स गिरना मौतों का सबसे बड़ा कारण बनता है।

इस समय अभी डेंगू के ज्यादा मरीज सामने नहीं आ रहे है। हॉस्टल के आउटडोर में सामान्य वायरल बुखार के मरीज आ रहे हैं। इसके अलावा डेंगू जैसे लक्षणों वाले मरीज जो जांच में पॉजिटिव नहीं आते, उन्हें लुक लाइट डेंगू के आधार पर ही इलाज दिया जाता है।

सामान्य बुखार भी सात दिन तक नहीं उतर रहा, लिक्विड डाइट पर रख रहे मरीजों को

बारिश के बाद सामान्य बुखार में भी मरीजों को ठीक होने में सप्ताह भर से ज्यादा का समय लग रहा है। डॉ. विशाल गुप्ता के अनुसार अभी वायरल फीवर के मरीज तो आ ही रहे हैं, जो लॉ ग्रेड फीवर के मरीज है।

इनके साथ ही हाई ग्रेड फीवर वाले मरीज भी आ रहे हैं, जिनके शरीर में दर्द, सिर दर्द, बुखार नहीं उतरने की शिकायत है। ऐसे मरीजों को ठीक होने में सप्ताह भर या उससे ज्यादा समय लग रहा है।

ऐसे मरीजों को हम डेंगू जैसा बुखार मानकर इलाज करते हैं। मरीजों को लिक्विड डायट पर रखा जाता है। हालांकि इसमें काॅम्प्लिकेशन नहीं आ रहे हैं और दवाओं से मरीज ठीक हो रहे हैं।



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