जस्टिस डॉ. पीएस भाटी ने किया लोक अदालत का विधिवत शुभारंभ।
राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की मॉनिटरिंग में शनिवार को राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन हुआ। राजस्थान हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति के अध्यक्ष जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी ने मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर इस न्यायिक पहल का शुभ
जस्टिस डॉ. भाटी ने अपने उद्बोधन में कहा- लोक अदालत एक ऐसा पर्व है, जिसमें विधि जगत आम नागरिक की उस आखिरी कड़ी से जुड़ने का प्रयास करता है। यहां उनकी मर्जी और समझाइश से सकारात्मक परिणाम प्राप्त करने का प्रयास होता है। इससे समाज में संतुष्टि और सद्भावना बढ़ती है।

जस्टिस भाटी ने कहा- राजस्थान की न्यायपालिका सब तरफ से लोक अदालत के लिए बहुत ही अच्छा कार्य कर रही है। उसी का परिणाम है कि आज लोक अदालत में पूरे राजस्थान में दूरदराज से लेकर जोधपुर, जयपुर में हजारों मुकदमे निस्तारित होने की संभावना दिखी। इस पूरे प्रयास में सभी अधिवक्तागण व न्यायाधीशगण मिलकर अथक प्रयास कर रहे हैं।
चार बेंचों में हुई सुनवाई
राजस्थान हाईकोर्ट विधिक सेवा समिति के सचिव कमल छंगाणी ने बताया- इस लोक अदालत में राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर में 4 बैंचों का गठन किया गया था। बेंच संख्या 1 में जस्टिस मुकेश राजपुरोहित अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील राजेश जोशी सदस्य के रूप में कार्य किया। बेंच संख्या 2 में जस्टिस संदीप तनेजा अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील धीरेंद्र सिंह चम्पावत सदस्य थे।
बेंच संख्या 3 में जस्टिस बिपिन गुप्ता अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता मनीष सिसोदिया ने सदस्य के रूप में कार्य किया। बेंच संख्या 4 में जस्टिस रवि चिरानिया अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अशोक सोनी सदस्य के रूप में शामिल थे।
9.40 करोड़ रुपए के अवॉर्ड पारित
सभी बेंचों ने पक्षकारों के बीच समझाइश करवाकर विभिन्न प्रकृति के कुल 286 प्रकरणों का निस्तारण किया। इन मामलों में कुल 9 करोड़ 40 लाख 46 हजार 757 रुपए के अवॉर्ड पारित किए गए। यह राशि विभिन्न प्रकार के विवादों के समाधान के रूप में निर्धारित की गई।

दो पक्षों के साथ आपसी समझाइश से निकाले गए समाधान।
प्रदेश में 498 बैचों का गठन
प्रदेशभर की अदालतों में कुल 498 बैंचों का गठन किया गया था। इसमें प्री-लिटिगेशन के करीब 6.65 लाख प्रकरण और न्यायालयों में लंबित 2.63 लाख सहित करीब कुल साढ़े 9 लाख मुकदमों को सुनवाई के लिए चिह्नित किया गया था। आमजन को सस्ता, सुलभ और त्वरित न्याय उपलब्ध कराना इस पहल का मुख्य उद्देश्य है।
वैधानिक दर्जा प्राप्त है लोक अदालत
लोक अदालतों को विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 के अंतर्गत वैधानिक दर्जा प्राप्त है। इनके द्वारा दिया गया निर्णय सिविल न्यायालय का आदेश माना जाता है तथा यह अंतिम और सभी पक्षों पर बाध्यकारी होता है। यह व्यवस्था न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या कम करने और न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
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