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गुजरात के डाकोर के फेमस मंदिर श्री रणछोड़ राय मंदिर के दर्शन अभी तक आपने नहीं किए हैं, तो आप तीर्थनगरी पुष्कर चले आइए। यहां भगवान द्वारिकाधीश का एक हजार साल पुराना मंदिर है, जहां भगवान श्रीकृष्ण के चतुर्भुजधारी द्वारिकाधीश के रूप में दर्शन होते हैं।
मंदिर के पुजारी बद्रीविशाल रामानुज वैष्णवदास बताते हैं कि मंदिर एक हजार साल पुराना है। इस मंदिर को रामानुज संप्रदाय के जगतगुरु पुरुषोत्तमदास ने बनवाया था। जब पैदल गुजरात या डाकोर जाना मुश्किल होता था, इसलिए मंदिर बनाया ताकि भक्तों को रणछोड़राय जी के दर्शन हो सकें। मंदिर में डाकोर के द्वारिकाधीश चतुर्भुज धारी प्रतिमा की तरह हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं। मंदिर में रामानुज संप्रदाय के पुजारी दक्षिण भारतीय शैली से पूजा-अर्चना करते हैं। यहां दिन में 8 आरती मंत्रों के रूप में होती हैं।
मंदिर में भगवान विष्णु के कई अवतारों की प्रतिमाओं के साथ हनुमान, वाहन गरुड जी की प्रतिमा है। मंदिर का नाम भगवान रणछोड़ राय (द्वारिकाधीश) मंदिर है। स्थानीय भाषा में अष्ट भू वैकुंठ आश्रम के नाम से जाना जाता है।
इसलिए कृष्ण कहलाए रणछोड़
कथाओं के अनुसार मगध के राजा जरासंध से युद्ध के समय कृष्ण कालयवन नाम के राक्षस से बचने के लिए युद्ध भूमि को छोड़ गए। कालयवन को भगवान शंकर का वरदान था कि उसे कोई चंद्रवंशी या सूर्यवंशी पराजित नहीं कर सकता, न ही कोई अस्त्र-शस्त्र से उसकी मृत्यु होगी। कालयवन भी कृष्ण के पीछे-पीछे गया। कृष्ण एक गुफा में पहुंच गए। राजा मुचुकुन्द सो रहे थे। कालयवन भी गुफा में पहुंच गया।
कृष्ण ने अपनी चादर मुचुकुन्द पर डाल दी और स्वयं छिप गए। कालयवन ने मुचुकुन्द को श्रीकृष्ण समझकर जगा दिया, जिससे मुचुकुन्द की दृष्टि पड़ते ही कालयवन भस्म हो गया। राजा मुचुकुंद को वरदान था कि जो उन्हें नींद से उठाएगा, वह भस्म हो जाएगा। इसके बाद से ही भगवान कृष्ण को रण छोड़कर जाने के कारण रणछोड़ कहा जाता है। इसे भगवान की मुख्य लीला मानी जाती है।
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