कंडम बसों के सहारे झुंझुनूं रोडवेज
झुंझुनूं रोडवेज डिपो का हाल ऐसा है कि यहां के यात्रियों का सफर कंडम बसों के भरोसे चल रही है। डिपो की 62 सरकारी बसों में से 33 बसें 8 से 13 साल पुरानी होकर पूरी तरह से कंडम हो चुकी हैं। ये बसें न सिर्फ बार-बार बीच रास्ते में खराब हो रही हैं, बल्कि यात
आधे से ज्यादा बसें कंडम
झुंझुनूं डिपो के पास फिलहाल कुल 81 बसों का बेड़ा है। इनमें 62 बसें रोडवेज की खुद की और 19 अनुबंधित बसें शामिल हैं। 62 निगम बसों में से 33 गाड़ियां 8 से 13 साल पुरानी हो चुकी हैं। रोडवेज के नियम के मुताबिक 8 साल पुरानी या 8 लाख किलोमीटर चल चुकी बस को कंडम घोषित कर दिया जाता है। लेकिन झुंझुनूं डिपो में इन्हें मेंटिनेंस करके जबरन सड़क पर उतारा जा रहा है। इसका नतीजा यह है कि हर महीने औसतन 8 से 10 बसें बीच रास्ते में खराब हो जाती हैं।

कंडम बसों के सहारे झुंझुनूं रोडवेज
यात्रियों की जान खतरे में
पिछले दिनों झुंझुनूं से चंडीगढ़ जा रही बस चंडीगढ़ से पहले ही रास्ते में खराब हो गई। यात्रियों को अन्य साधनों से गंतव्य तक भेजना पड़ा। बस को वहीं रिपेयर कराकर तीन दिन बाद झुंझुनूं लाया गया। इसी तरह उदयपुरवाटी जा रही बस गुढ़ागौड़जी से पहले बिगड़ गई। यात्रियों को दूसरी बसों में बैठाकर भेजना पड़ा और झुंझुनूं से स्टाफ व गाड़ी भेजकर उसे दुरुस्त करना पड़ा। ऐसे उदाहरण रोजमर्रा की परेशानी बन चुके हैं।
आर्थिक नुकसान भी भारी
पुरानी बसों की बार-बार खराबी से रोडवेज को हर महीने औसतन 10 लाख रुपए का घाटा हो रहा है। अनुबंधित बसों पर ज्यादा निर्भरता करनी पड़ रही है, जिन्हें लंबे रूट पर चलाना मजबूरी है। इसके बावजूद मुख्यालय ने झुंझुनूं डिपो का लक्ष्य घटाने की बजाय और बढ़ा दिया है। अगस्त में 10.13 लाख किलोमीटर चलाने और 4.63 करोड़ आय का लक्ष्य था, जिसे सितंबर में बढ़ाकर 10.69 लाख किलोमीटर और 4.88 करोड़ कर दिया गया।
नई बसें नहीं, सिर्फ वादे
प्रदेशभर में हाल ही में 288 नई बसें आईं, जिनमें जयपुर समेत कई डिपो को 5 से 20 बसें मिलीं। सीकर और खेतड़ी डिपो को भी नई बसें आवंटित हुईं, लेकिन झुंझुनूं को एक भी बस नहीं मिली। जबकि यहां से 31 बसों की मांग मुख्यालय को भेजी गई थी। अब उम्मीद जताई जा रही है कि दूसरी खेप में कुछ बसें मिल सकती हैं।

आधे से ज्यादा बेड़ा पुराना, हर माह ब्रेकडाउन से यात्री परेशान, निगम को लाखों का घाटा और लक्ष्य लगातार बढ़ाए जा रहे
अधिकारी का कहना
डिपो चीफ मैनेजर गिरिराज स्वामी का कहना है कि 31 बसों की मांग की गई थी, लेकिन पहली खेप में नहीं मिलीं। दूसरी खेप में बसें मिलने की उम्मीद है। उन्होंने माना कि स्टाफ की कमी और पुरानी बसों की वजह से कामकाज प्रभावित हो रहा है, लेकिन आय में सुधार लाने का प्रयास किया जा रहा है।
डिपो की एमओ मोनिका ने भी स्वीकार किया कि 2013 और 2017 मॉडल की पुरानी गाड़ियां मेंटिनेंस पर चल रही हैं, जिनके कारण बार-बार ब्रेकडाउन हो रहा है और डिपो को नुकसान उठाना पड़ रहा है।
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