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मम्मी ठीक होने वाली थी, पर ये हादसा हो गया। वो अपनी मां को नहीं बचा पाया, क्योंकि कोई भी उसकी मां को बचाने नहीं गया। अस्पताल के लोग भी वहां से भाग गए।

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यह कहना है उन परिवारों का, जिन्होंने अपनों को खोया। जयपुर के एसएमएस हॉस्पिटल के ट्रॉमा सेंटर में आग लगने से 8 मरीजों की मौत हो गई। मृतकों में 3 महिलाएं शामिल हैं। रविवार रात करीब 11:20 बजे न्यूरो आईसीयू के कमरा नंबर 201 में आग लगी थी।

भास्कर की टीम ने मौके पर पहुंचकर देखा कि हादसे के 2 घंटे बाद भी वहां सांस लेना मुश्किल था। वार्ड में राख, जली हुई ड्रिप, बिखरे बेड और जली हुई सीलिंग थी। एसी भी जल गए थे और चारों तरफ आग के निशान थे।

फायर विभाग के कर्मचारी अवधेश पांडे ने बताया कि वार्ड धुएं से भरा था और अंदर जाने का कोई रास्ता नहीं था। खिड़की के कांच तोड़कर पानी डाला गया और एक से डेढ़ घंटे में आग पर काबू पाया गया। उस वक्त मरीज और उनके परिजन अंदर थे, जिन्हें एक-एक कर बाहर निकाला गया।

एसएमएस हॉस्पिटल के ट्रॉमा सेंटर में आग पर काबू पाने में एक से डेढ़ घंटे का समय लगा।

एसएमएस हॉस्पिटल के ट्रॉमा सेंटर में आग पर काबू पाने में एक से डेढ़ घंटे का समय लगा।

जानिए, उन परिवारों ने क्या कहा, जिन्होंने अपनों को खोया..

धुएं के कारण उसका पूरा मुंह काला हो गया था हादसे में मरने वाले पिंटू के मौसी के बेटे ओमप्रकाश ने बताया- रात 11:30 बजे के करीब पिंटू के कमरे से धुआं निकलना शुरू हो गया था, लेकिन अस्पताल के किसी भी आदमी या डॉक्टर ने इस पर ध्यान नहीं दिया। घटना के डेढ़ घंटे बाद उन्होंने खुद ही पिंटू को कमरे से बाहर निकाला, और उन्हें अस्पताल से कोई मदद नहीं मिली।

ओमप्रकाश ने बताया कि पिंटू 3 नंबर बेड पर था। आग से उसका शरीर नहीं जला था, लेकिन कमरे में धुएं के कारण उसका पूरा मुंह काला हो गया था। जब वे पिंटू को नीचे लेकर गए, तो वहां कोई डॉक्टर नहीं था। पिंटू अपने परिवार में माता-पिता और एक भाई को छोड़ गए हैं। उनका परिवार खेती करके अपना जीवन चलाता है। डॉक्टर और स्टाफ छोड़कर भाग गया।

जोगेंद्र, जिन्होंने हादसे में अपनी मां को खो दिया।

जोगेंद्र, जिन्होंने हादसे में अपनी मां को खो दिया।

मम्मी ठीक होने वाली थी, पर ये हादसा हो गया​​​​​​ रुक्मणी (मृतक) के बेटे जोगेंद्र ने बताया कि वो 17-18 दिन से अस्पताल में था। उसकी मम्मी ठीक होने वाली थी, पर ये हादसा हो गया। ये बोलते हुए जोगेंद्र का गला भर आया। जोगेंद्र ने कहा कि जब आग लगी, तब वहां 15-16 लोग थे। उन्होंने अस्पताल के लोगों से पूछा कि धुआं क्यों हो रहा है। उन्होंने धुआं देखकर कहा, “हां, धुआं तो हो रहा है।” वहां जो लोग थे, वो अपने-अपने मरीजों को लेकर निकलने की कोशिश कर रहे थे। धुआं इतना ज्यादा था कि कई मरीज अंदर ही रह गए।

1 घंटे बाद उसकी मम्मी को निकाला गया जोगेंद्र ने कहा कि उसकी मम्मी को किसी ने नहीं निकाला। वार्ड में इतना धुआं था कि कुछ दिख नहीं रहा था। ऐसे में उसके बड़े भाई ने अस्पताल के लोगों से टॉर्च ली और मम्मी को ढूंढ़कर बाहर निकाला। उसकी भी तबीयत खराब हो गई और वो उल्टी कर रहा था।

आग लगने के 1 घंटे बाद उसकी मम्मी को निकाला गया। वो नीचे फंसा हुआ था और उसे ऊपर जाने नहीं दिया गया। जोगेंद्र रोते हुए बोला कि वो अपनी मां को नहीं बचा पाया। उसकी मां को बचाने कोई नहीं गया। उसका बड़ा भाई 1 घंटे बाद पीछे से ऊपर गया और उसने मम्मी को बाहर निकाला।

आग लगने के बाद अफरा-तफरी मच गई। लोग अपनों को बचाने में जुट गए।

आग लगने के बाद अफरा-तफरी मच गई। लोग अपनों को बचाने में जुट गए।

प्लास्टिक की पाइप पिघलकर गिरने लगी शेरू ने कहा कि उसकी मां कुछ दिनों से अस्पताल में भर्ती थी। धीरे-धीरे धुआं निकलने लगा, तो उन्होंने वहां के स्टाफ को बताया कि धुआं आ रहा है, पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। रात 11:20 तक धुआं और बढ़ने लगा और प्लास्टिक की पाइप पिघलकर गिरने लगी। वहां जो वार्ड बॉय था, वो भाग गया।

शेरू ने बताया कि वो अपने मरीज को बाहर नहीं निकाल पा रहे थे। उन्होंने बहुत कोशिश की, पर धुएं की वजह से कुछ दिख नहीं रहा था। वहां जो गार्ड और स्टाफ थे, वो सबसे पहले भागे। उन्होंने अपने मरीज को खुद ही बाहर निकाला। हादसे के दो घंटे बाद मरीज को नीचे ग्राउंड फ्लोर पर ले जाया गया। अभी तक ये नहीं पता कि उसकी मां कैसी है। उन्हें मिलने नहीं दिया जा रहा है।

किशन कंवर, बेटे दिलीप सिंह को याद कर रोते हुए। उन्होंने कहा- बेटे को बाहर निकालने की कोशिश की, लेकिन वह अपने बेटे को बाहर नहीं निकाल सकीं।

किशन कंवर, बेटे दिलीप सिंह को याद कर रोते हुए। उन्होंने कहा- बेटे को बाहर निकालने की कोशिश की, लेकिन वह अपने बेटे को बाहर नहीं निकाल सकीं।

मदद के लिए चिल्लाती रहीं, किसी ने मदद नहीं की किशन कंवर ने बताया कि उनका बेटा, दिलीप सिंह, 23 सितंबर को सीढ़ियों से गिरने के कारण अस्पताल में भर्ती था। उन्होंने बताया कि जब अंदर धुआं आया, तो वह अपने दूसरे बेटे को बुलाने के लिए बाहर गईं, लेकिन वह वहां नहीं था।

हाथ से हाथ भी नहीं दिख रहा था किशन कंवर ने बताया कि वह वापस अंदर गईं और अपने बेटे को हाथ-पांव खींचकर बाहर निकालने की कोशिश की। धुआं इतना ज्यादा था कि हाथ से हाथ भी नहीं दिख रहा था। उन्होंने मदद के लिए चिल्लाती रहीं, लेकिन किसी ने भी उनकी मदद नहीं की। किशन कंवर ने बताया कि उन्होंने बहुत खींचने की कोशिश की, लेकिन वह अपने बेटे को बाहर नहीं निकाल सकीं।

मौसी को होश आने का इंतजार था, पर हादसा हो गया रमाकांत ने बताया कि उनकी मौसी, सर्वेश देवी, की भी इस हादसे में मौत हो गई। उन्होंने बताया कि आग लगने के दौरान सब लोग अपने मरीजों को लेकर भाग रहे थे। उनकी मौसी का बाइक से एक्सीडेंट हुआ था, जिसके कारण उनके सिर में चोट लगी थी।

कल सुबह 6.30 बजे उनका ऑपरेशन हुआ था और डॉक्टरों ने कहा था कि 24 घंटे बाद उन्हें होश आ जाएगा। लेकिन उन 24 घंटों में ही यह हादसा हो गया।

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