मानव जीवन में दुख के दो ही कारण हैं- अहमता और ममता। यदि इन दो स्वभावों पर नियंत्रण कर लिया जाए, तो कोई भी व्यक्ति आपको दुखी नहीं कर सकता। ‘मैं’ और ‘मेरा’ का भाव ही दुख का कारण बनता है, जैसे पिता का अपने पुत्र के प्रति अत्यधिक मोह। यह बात प्रसिद्ध कथा

मंच पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से आशीर्वाद लेते हुए कथावाचक पंडित इंद्रेश उपाध्याय।
ज्ञान यज्ञ और श्रीमद् भागवत की महिमा
गोकर्ण महाराज की ज्ञान यज्ञ की महत्ता पर जोर देते हुए पंडित इंद्रेश ने कहा- श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का समन्वय है। उन्होंने सनत कुमार के हवाले से वेद और भागवत के अंतर को स्पष्ट किया। कथावाचक ने कहा- वेद एक वृक्ष हैं, और श्रीमद् भागवत उसका पका हुआ फल। वृक्ष पेट नहीं भरता, लेकिन फल रस और तृप्ति देता है। भागवत कथा न केवल भक्ति का रस प्रदान करती है, बल्कि संसार की भूख को शांत कर एकांत और आत्मचिंतन की प्रेरणा देती है। यह कथा इंद्रियों को नियंत्रित कर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य को पुष्ट करती है।
आत्मदेव की कथा: संतान प्राप्ति के नियम
कथा में पंडित इंद्रेश उपाध्याय ने गोकर्ण महाराज व आत्मदेव नामक ब्राह्मण की कहानी सुनाई, जिन्हें संतान न होने का दुख था। एक ऋषि ने उन्हें फल देकर संतान प्राप्ति का उपाय बताया, लेकिन साथ ही नियमों का पालन करने की सलाह दी। ये नियम थे- सत्य बोलना, शुद्धता, दया, दान, और एक समय भोजन। इन नियमों के पालन से आत्मदेव को दिव्य संतान की प्राप्ति हुई। कथावाचक ने कहा- आज के युग में दिव्य आत्माएं पृथ्वी पर जन्म लेना चाहती हैं, लेकिन उन्हें पवित्र माता-पिता की आवश्यकता होती है। विवाह के बाद दंपती को अपने विचार और जीवन को इतना पवित्र करना चाहिए कि दिव्य आत्माएं उनके यहां जन्म लेना चाहें।
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