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सीकर के रैवासा धाम में चल रहे ‘सियपिय मिलन महोत्सव’ में श्रीमद् भागवत कथा के चौथे दिन प्रसिद्ध कथावाचक पंडित इंद्रेश उपाध्याय ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने विचार व्यक्त किए। उपाध्याय ने श्रद्धालुओं को आजादी का असली अर्थ समझाया। उन्होंने कहा कि वास्तविक
पंडित उपाध्याय ने कहा- स्वतंत्रता दिवस का मतलब केवल अंग्रेजों से आजादी नहीं है। देश तो आजाद हो गया, लेकिन विचारों में कई जगह हम आज भी परतंत्र हैं। असली स्वतंत्र वही है, जिसके माथे पर तिलक हो, जो धोती और कुर्ता पहनता हो। यह भारतीय संस्कृति की पहचान है। उन्होंने कहा- अंग्रेजों की बुद्धि और उनके द्वारा थोपी गई मानसिकता को आज भी कुछ लोग ढो रहे हैं, जो वास्तविक स्वतंत्रता के मार्ग में बाधा है।
भारतीय परिधान और शुद्ध हिंदी ही असली आजादी
कथावाचक ने उपस्थित जनसमूह से अपील की कि कम से कम स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर भारतीय परिधान धारण करें और शुद्ध हिंदी में बात करें। उन्होंने ‘हैप्पी इंडिपेंडेंस डे’ जैसे अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग पर आपत्ति जताते हुए कहा- स्वतंत्रता हमारा शब्द है, इंडिपेंडेंस अंग्रेजों का। हमें अपने विचारों और व्यवहार में भी भारतीयता लानी होगी।
वैष्णव-ब्राह्मण हैं असली स्वतंत्रता सेनानी
पंडित उपाध्याय ने वैष्णव ब्राह्मणों और संतों को असली स्वतंत्रता सेनानी बताते हुए कहा कि ये वो लोग हैं, जिन्होंने अंग्रेजों के प्रभाव को कभी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने तिलक, शिखा और भारतीय परिधानों को अपनाने की प्रेरणा दी। साथ ही, सैनिकों को बाहरी रक्षा के लिए प्रणाम करते हुए कहा कि आंतरिक सांस्कृतिक रक्षा का दायित्व वैष्णव और संतों पर है।
उन्होंने सभी भारतवासियों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं दीं, विशेष रूप से उन लोगों को, जो भारतीय विचार, भेष और व्यवहार में विश्वास रखते हैं।
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