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यूजीसी स्नातक स्तर पर गणित के पाठ्यक्रम में आधुनिक गणित के साथ-साथ वैदिक गणित का समावेश करने के लिए ड्राफ्ट तैयार कर रही है। उसे अंतिम रूप देने के बाद देश के विश्वविद्यालयों में वैदिक गणित, खगोल और ज्यामिति के अध्ययन का नया रास्ता खुलेगा। इससे राजस्थ

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खासतौर से यह जन्मपत्री से लेकर सूर्य की किरणों की छाया से काल गणना, राशियों की गणना आदि के लिए विशेष है। राव माधोसिंह संग्रहालय ट्रस्ट के क्यूरेटर पं. आशुतोष दाधीच बताते हैं कि ज्योतिषाचार्य सूर्य, चंद्रमा आदि की गति, नक्षत्र और राशियों के परिवर्तन की गणना करते थे। इसी से पंचांग और जंत्री का निर्माण किया जाता था। यह अष्टधातु से निर्मित है।

गणित-ज्योतिष अध्ययन के लिए उपयोगी यंत्र

राजकीय संस्कृत कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल डॉ. खगेंद्र झा का कहना है कि कोटा का यह खगोल यंत्र ज्योतिष और प्राचीन गणित की पढ़ाई के लिए खास है। काल गणना के लिए यह बेहतर यंत्र है। यहां जल घड़ी भी है। यह संपूर्ण गणित और ज्योतिष सीखने, जानने और व्यावाहारिक रूप से समझने के लिए खास यंत्र है। इसके माध्यम से रिसर्च के साथ-साथ छात्र ज्योतिष और गणित की जानकारी ले सकेंगे।

यंत्र सूर्य की किरणों से काल-ज्योतिषीय गणना करता है राव माधोसिंह संग्रहालय के क्यूरेटर आशुतोष दाधीच बताते हैं कि 18वीं शताब्दी में तैयार किए गए इस गोल यंत्र की 7 भुजाओं पर गणितीय अंकों में अक्षांश और देशांतर अंकित हैं। एक भुजा पर 12 राशियां अंकित हैं। यंत्र की 6 भुजाओं को एक विशेष एंगल पर स्थिर कर राशियों वाली भुजा को इनके सामने लाते हुए सूर्य की किरणों के साथ काल गणना, ज्योतिषीय गणना और गणितीय गणना की जाती थी। ग्रहों के राशि परिर्वतन का पता भी इसी प्रक्रिया से किया जाता था। हर साल तैयार होने वाला पंचाग और जंत्री इसी की मदद से तैयार किए जाते थे।



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