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राजस्थान हाईकोर्ट ने नए राजस्व गांवों के गठन और नामकरण को लेकर दायर 12 रिट याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार को जहां तक संभव हो, राजस्व गांवों का नाम किसी व्यक्ति, जाति, उप-जाति या धर्म के आधार पर नहीं रखना चाहिए।

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जस्टिस कुलदीप माथुर ने यह भी कहा कि केवल तभी इस तरह के नामकरण पर आपत्ति की जा सकती है, जब यह साबित हो जाए कि गांव का नाम किसी विशेष धार्मिक या राजनीतिक समुदाय को खुश करने, किसी राजनीतिक प्रभावशाली व्यक्ति या प्रतिनिधि के प्रभाव में या गांव के मामलों से जुड़े किसी जीवित व्यक्ति के नाम पर मनमाने तरीके से रखा गया है।

हाईकोर्ट ने सभी रिट याचिकाओं को खारिज कर, कहा कि इनमें कोई दम नहीं है। साथ ही निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ताओं को जनसंख्या और दूरी के मापदंडों के उल्लंघन की शिकायत है, तो वे आज से 30 दिन के भीतर राज्य सरकार के सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अभ्यावेदन दे सकते हैं। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि ऐसा कोई परिवाद दिया जाता है तो संबंधित राज्य प्राधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह उस पर यथाशीघ्र विचार करे और निर्णय ले।

पुराने में से नए गांव बनाने व नामकरण पर आपत्तियां

हाईकोर्ट में दायर रिट याचिकाओं में विभिन्न जिलों में सृजित नए राजस्व गांवों को चुनौती दी गई थी। जोधपुर जिले के हतुंडी गांव से ‘हरकानाडा’ और ‘डेरों की ढाणी’ नाम से दो नए गांव बनाने, सोमेसर से ‘सोमेसर कलां’, बाड़मेर जिले के सिंगोड़िया से ‘आदर्श नया सिंगोड़िया’, ‘बाटाडू दक्षिण’ और ‘आदर्श नया बाताडू’ नाम के गांव बनाने की अधिसूचना को चुनौती दी गई थी। इसी तरह, भीमडा से ‘अम्बेडकर नगर’, जालोर के सुराणा से ‘नया सुराणा’, बालोतरा के तालबानियो की ढाणी से ‘केरलिया नाडा’ और ‘काकडों की ढाणी’, रियां से ‘चांदपुरा’, सोलंकिया तला से ‘फूसा नगर’, हरसाणी से ‘किशनदासोत नगर’ और ‘अखेराज नगर’ तथा सोहडा से ‘चौहान नगर’ जैसे गांवों के गठन को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ताओं के मुख्य आरोप

याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने 20 अगस्त 2009, 17, 18 व 28 फरवरी 2025 और 6 मार्च 2025 के परिपत्रों में निर्धारित दिशा-निर्देशों और मापदंडों का उल्लंघन करते हुए नए राजस्व गांवों का सृजन किया है। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इन गांवों का नामकरण किसी व्यक्ति विशेष, धर्म, जाति या उप-जाति के आधार पर किया गया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि नए राजस्व गांव बनाने से पहले ग्राम सभा की बैठक नहीं बुलाई गई और न्यूनतम जनसंख्या की शर्त भी पूरी नहीं की गई।

सरकार: नए गांव बनाने या सीमा परिवर्तन का अधिकार

राज्य सरकार के वकील ने तर्क दिया कि राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम 1956 की धारा 16 के तहत राज्य सरकार को नए गांव बनाने या उनकी सीमाओं में परिवर्तन करने का पूर्ण अधिकार है। उन्होंने कहा कि नए राजस्व गांव का सृजन एक विधायी कार्य है और अदालत को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। सरकारी पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि जारी परिपत्रों का कोई वैधानिक बल नहीं है और ये केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए दिशा-निर्देश हैं।

कोर्ट ने माना- गांव गठन प्रशासनिक कार्य

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के साइनामाइड इंडिया लिमिटेड मामले और तेहल सिंह मामले के फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि नए राजस्व गांव का सृजन एक प्रशासनिक कार्य है, न कि विधायी। राजस्व गांव न केवल राजस्व प्रशासन की मूलभूत इकाई हैं, बल्कि विकास और योजना के लिए भी महत्वपूर्ण आधार बिंदु हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि यद्यपि प्रशासनिक निर्णय कार्यपालिका का अधिकार क्षेत्र है, लेकिन यदि ये निर्णय मनमाने तरीके से, दुर्भावनापूर्ण इरादे से या बिना उचित विचार के यांत्रिक रूप से लिए गए हों तो इनमें हस्तक्षेप किया जा सकता है।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे जहां तक संभव हो, परिपत्रों के इन दिशा-निर्देशों और मापदंडों का पालन करें, ताकि नए गांव के सृजन में किसी प्रकार की मनमानी से बचा जा सके।

नामकरण के लिए विशेष दिशा-निर्देश

हाईकोर्ट ने नामकरण के मुद्दे पर कहा कि ऐतिहासिक रूप से भारत के शहरों और कस्बों, चाहे वे ग्रामीण हों या शहरी, का नामकरण धार्मिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक व्यक्तित्वों के साथ-साथ भौगोलिक विशेषताओं और औपनिवेशिक पहचान के मिश्रण के आधार पर हुआ है। नामकरण में कोई जानबूझकर और सुविचारित विचलन नहीं दिखता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि यह किसी विशेष समुदाय को खुश करने या राजनीतिक प्रभाव के तहत किया गया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 28 फरवरी और 6 मार्च 2025 के परिपत्रों के अनुसार प्रत्येक मामले में ग्राम सभा की बैठक बुलाना बाध्यकारी नहीं है। यह वैकल्पिक व्यवस्था इसलिए की गई, क्योंकि आम सहमति प्राप्त करने में कठिनाइयां आ रही थीं, जिससे विकास कार्यों में बाधा पड़ रही थी।



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