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-डाॅ. संदीप गुप्ता, ओंकाे सर्जन, आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर रिसर्च सेंटर

“डॉक्टर साहब, क्या मेरे पति बच जाएंगे?” आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर रिसर्च सेंटर में जगनार (65) (बदला हुआ नाम) की पत्नी रोते हुए यह सवाल पूछ रही थीं। जगनार स्टेज-4 ओरल कैंसर से जूझ रहे थे। चेहरा दर्द से सिकुड़ता जा रहा था। खाना लगभग बंद था। आंखों में हर

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ऑन्को सर्जन डॉ. संदीप गुप्ता ने जयपुर में अपने बैचमेट सीटीवीएस सर्जन डॉ. अंकित माथुर से बात की। उन्होंने मरीज को अपने पास बुला लिया। जयपुर के हॉस्पिटल में उसका बाइपास हुआ। अब बारी थी कैंसर से लड़ाई की। घंटों चली बड़ी सर्जरी और रिकंस्ट्रक्शन। यहां एनेस्थीसिया की प्रोफेसर डॉ. सोनाली धवन का हुनर काम आया। करीब 10 घंटे की सर्जरी के बाद ऑपरेशन थियेटर से बाहर आते ही डॉ. संदीप गुप्ता ने महिला से कहा, “मरीज अब ठीक हैं,” तो पत्नी की आंखों से आंसू छलक पड़े।

चौथी स्टेज में चार क्रिटिकल सर्जरी, 9 साल से इलाज

केस 1. चूरू निवासी रमकू (बदला हुआ नाम) के मुंह में चौथी स्टेज का कैंसर था। तंबाकू और गुटखे का सेवन करते थे। वर्ष 2016 में कैंसर सेंटर में ऑपरेशन हुआ था। आज भी नॉर्मल लाइफ जी रहे हैं।

केस 2. हनुमानगढ़ के नोहर निवासी दसेराम (बदला हुआ नाम) को पैंक्रियाज का कैंसर था। वर्ष 2018 में उनका मेजर ऑपरेशन हुआ था। दसेराम आज भी स्वस्थ हैं।

केस 3. हनुमानगढ़ के नोहर निवासी 50 वर्षीय रामसुख (बदला हुआ नाम) को भी पैंक्रियाज का कैंसर था। कैंसर हॉस्पिटल में 2019 में उनका ऑपरेशन हुआ। आज स्वस्थ हैं।

टाटा मेमोरियल से एमओयू होने पर आएंगे बेहतर रिजल्ट

कैंसर ट्रीटमेंट के मामले में बीकानेर की पहचान पहले से ही है। क्योंकि यहां देश का 13वां कैंसर रिसर्च सेंटर है। जल्दी ही टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के साथ एमओयू होने के बाद यहां पर इलाज की और भी अधिक बेहतर सुविधाएं विकसित होंगी।

भास्कर एक्सपर्ट — डॉ. संदीप गुप्ता, ऑन्को सर्जन, आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर रिसर्च सेंटर

भारत में मुंह का कैंसर पुरुषों में ज्यादा 14.7%

विश्व कैंसर रिसर्च फंड के अनुसार 2022 में विश्व में मुंह के कैंसर के 1,43,759 नए मामले सामने आए। पुरुषों में यह दर सबसे ज्यादा 14.7 प्रतिशत प्रति 1,00,000, जबकि महिलाओं में 5.5 प्रति 1,00,000 है। भारत में अधिकांश मरीज देर से अस्पताल में आते हैं। लगभग 70% मरीज उस वक्त आते हैं जब कैंसर तीसरी या चौथी स्टेज में पहुंच जाता है। देर से आने के कारण इलाज कठिन हो जाता है और मृत्यु दर अधिक रहती है। इसका मुख्य कारण तंबाकू, गुटखा, सुपारी, शराब का सेवन एवं अस्वस्थ भोजन है। समय पर स्क्रीनिंग और जागरूकता की कमी होने से यह समस्या बढ़ रही है।

“आम तौर पर मरीज तीसरी और चौथी स्टेज में पहुंचते हैं, लेकिन काफी सारे मरीज इलाज के बाद स्वस्थ जीवन जी रहे हैं। बीमारी से बचने के लिए जागरूकता बहुत जरूरी है।”

-डॉ. नीति शर्मा, निदेशक, आचार्य तुलसी रीजनल कैंसर रिसर्च सेंटर



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