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शारदीय नवरात्र पर जयपुर में 40 से ज्यादा पांडाल ईको फ्रेंडली प्रतिमाओं से सजेंगे। इसके लिए गुलाबीनगरी में ही 10 से ज्यादा जगहों पर 100 से ज्यादा बंगाली कलाकार मूर्तियों को आकार देने में जुटे हैं।

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खास बात यह है कि मूर्तियों को बनाने के 20 हजार किलो चिकनी मिट्टी कट्टों में भरकर 1600 किलोमीटर दूर बंगाल से मंगवाई गई है। मूर्तियों के श्रृंगार का सामान कोलकाता की कोमोरटुली मार्केट से मंगवाया गया है।

इन मूर्तियों को तैयार करने में एक महीने से अधिक का समय लगता है। इसके बाद पूरे राजस्थान में सप्लाई होती है। ये प्रतिमाएं दो से तीन घंटे में घुल जाती हैं। यही कारण है कि प्रदेशभर में रह रहे बंगाली समाज में इनकी खास डिमांड रहती है।

100 से ज्यादा बंगाली कारीगर प्रतिमा बनाने में जुटे जयपुर में शंकर नगर, आमेर रोड, तिलक नगर, मोती डूंगरी रोड, दुर्गावाड़ी (शास्त्रीनगर) में इन दिनों 100 से ज्यादा बंगाली कारीगर मां दुर्गा की प्रतिमाओं को आकार देने में जुटे हैं। ये कलाकार मूर्तियां बनाने के लिए गणेश चतुर्थी से डेढ़-दो महीने पहले जुलाई-अगस्त में ही आ जाते हैं। अपने साथ बंगाल के मशहूर बाजारों से ही सारा सामान लेकर आते हैं।

ये मूर्तियां बंगाल से आई खास चिकनी मिट्टी से तैयार की गई हैं।

ये मूर्तियां बंगाल से आई खास चिकनी मिट्टी से तैयार की गई हैं।

आमेर रोड पर शंकर नगर के नजदीक 8-10 कारीगर मूर्तियां बनाने में जुटे हैं। यहां हमारी बात सोमनाथ कर से हुई। उन्होंने बताया दुर्गा पूजा के लिए जयपुर में दो तरह से प्रतिमाएं बनाई जाती हैं। एक पीओपी से बनती हैं, जिन पर प्रशासन की ओर से जल स्रोतों में विसर्जन पर प्रतिबन्ध है। पर्यावरण के अनुकूल न होने के कारण इन्हें शहर के किसी भी जलाशय में विसर्जन की अनुमति नहीं है।

मूर्ति बनाने में जुटी महिला कारीगर ग्यारसी ने बताया कि पीओपी से निर्मित दुर्गा प्रतिमाएं 7 से 8 घंटे में तैयार हो जाती हैं। रंग करने के बाद 1000 से 15000 (आकार के अनुसार) रुपए में बिक जाती हैं। इन्हें बनाने वाले राजस्थान के लोकल कारीगर हैं, जो गणेश चतुर्थी से लेकर सरस्वती पूजन तक इसी काम से रोजगार पाते हैं।

बंगाल के बर्धमान जिले से आई मिट्टी से मूर्ति तैयार करते कारीगर।

बंगाल के बर्धमान जिले से आई मिट्टी से मूर्ति तैयार करते कारीगर।

बंगाली समाज दुर्गा पूजा और अपनी संस्कृति के अनुसार परंपरागत दुर्गा प्रतिमाएं पांडालों में स्थापित करते हैं। इसके लिए खास बंगाल से आए कलाकार दो महीने में इन प्रतिमाओं को तैयार करने में जुट जाते हैं।

राजस्थान की मिट्‌टी से बड़ी प्रतिमाएं नहीं बन सकती हैं बंगाली ओर्नामेंट मेकर्स एसोसिएशन और धार्मिक ट्रस्ट, आमेर रोड के अध्यक्ष सोमनाथ कर बताते हैं- दुर्गा पूजा के लिए बंगाली समाज खास परंपरागत दुर्गा प्रतिमाओं को ही पांडाल में स्थापित करवाते हैं। इसके लिए कारीगर, श्रृंगार की चीजें यहां तक की मिट्टी भी बंगाल से मंगवाई जाती है। राजस्थान की बालू मिट्टी 12 फीट ऊंची और 18 से 20 फीट चौड़ी प्रतिमाएं बनाने के लिए सही नहीं है। इसके लिए हम बर्धमान जिले से 40 से 50 किलोग्राम वजन के 500 से ज्यादा चिकनी मिट्टी के कट्टे मंगवाते हैं।

एक महीने की इस अवधि में जयपुर में करीब 20,000 किलो मिट्टी बंगाल से ही आती है। बांस, सरकंडे के पत्ते, पुआल उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश से आता है। पूरी दुनिया में जहां-जहां भी बंगाल शैली की दुर्गा प्रतिमा बनती हैं, उसकी सजावट का सारा सामान कोलकाता की कोमोरटुली मार्केट से आता है। इनमें रंग, क्ले, कागज के गहने और दुर्गा जी के बालों के लिए स्पेशल जूट तक इसी मार्केट से मंगवाते हैं।

मूर्तियों के श्रृंगार का सामान कोलकाता के मशहूर बाजारों से मंगवाया जाता है।

मूर्तियों के श्रृंगार का सामान कोलकाता के मशहूर बाजारों से मंगवाया जाता है।

जयपुर में 10 से ज्यादा जगहों पर 100 से ज्यादा बंगाली कलाकार एक से दो महीने में इन प्रतिमाओं को तैयार करते हैं। अकेले जयपुर में 40 से ज्यादा भव्य दुर्गा पांडाल सजाए जाते हैं, जिनमें बंगाली कलाकारों के हाथों से बनी प्रतिमाएं ही स्थापित होती हैं। इसके अलावा जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर समेत जैसे बड़े जिलों समेत पूरे राजस्थान में जयपुर से ही प्रतिमाएं जाती हैं। पूरा बंगाली समाज इन्हीं प्रतिमाओं की पूजा करता है।

मां दुर्गा की एक मूर्ति आकार लेने के बाद।

मां दुर्गा की एक मूर्ति आकार लेने के बाद।

1 से 1.5 लाख तक में बिकती है प्रतिमाएं एक से दो महीने की मशक्कत के बाद ये प्रतिमाएं तैयार होती हैं। बड़े आकार की प्रतिमाओं में मां दुर्गा के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश, कार्तिकेय, सिंह, महिषासुर और सभी के वाहन और हथियार बनाए जाते हैं। इनका आकार 12 फीट की ऊंचाई से लेकर 20 फीट की लंबाई तक हो सकता है।

कारीगर गोलबदेब पिछले 20 साल से दुर्गा प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं।

कारीगर गोलबदेब पिछले 20 साल से दुर्गा प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं।

जयपुर के शंकनगर में 20 साल से मूर्ति बना रहे गोलबदेब बताते हैं- सुबह से देर रात तक काम करना पड़ता है, तब जाकर एक प्रतिमा पूरी होती है। बारिश या धूप, मिट्टी की नमी बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है। बड़ी मूर्ति बनाने में एक महीना भी लग जाता है। जितना ज्यादा डिटेलिंग होगा, उतना समय लगेगा।

दुर्गा पूजा और नवरात्र में इनकी कीमत एक से डेढ़ लाख रुपए तक होती है। इन मूर्तियों की खासियत है इसमें दुर्गा जी के श्रृंगार, गहनों, मुकुट, मालाओं और भाव भंगिमाओं को खास बंगाली कल्चर के अनुसार बनाया जाता है, जिसे यहां के कारीगर नहीं बना पाते हैं। होंठ की बनावट, आंखों और चेहरे का उभार खास तौर से बंगाली शैली की दुर्गा प्रतिमाओं की झलक देता है।

पीओपी मूर्ति के कारीगर बोले- ग्राहक घटे तिलकनगर में पीओपी की मूर्तियां बनाने वाली कारीगर ग्यारसी बताती हैं- बचपन से ही ये काम कर रही हूं। दो से तीन घंटे इन्हें सूखने में लगता है। सांचे में ढालकर पीओपी, नारियल के जूट और मिट्टी से बनाते हैं, जो 13 हजार तक बिक जाती हैं। लेकिन रंगने में काफी समय लगता है।

ओम जगदीश बताते हैं- अब इस काम में न तो पैसा है न ही लोग पहले जितने चाव से ले जाते हैं। दो दिन एक बड़ी प्रतिमा तैयार करने में लगते हैं। लेकिन इस काम में मेहनत ज्यादा है कमाई नहीं है। ग्राहक के ऊपर निर्भर करता है कितने में बिक जाएगी।

4 लाख बंगाली शहर में, दुर्गा विसर्जन बनी चुनौती, दो बच्चे डूब चुके जयपुर में यूं तो दुर्गावाड़ी, जयसिंहपुरा खोर, पुरानी बस्ती, विद्याधर नगर, वैशाली नगर, मानसरोवर जैसे बड़े इलाकों में 40 से ज्यादा दुर्गा पांडाल सजते हैं, लेकिन सबसे बड़ा आयोजन दुर्गावाड़ी और आमेर रोड स्थित शंकर नगर के काली माता मंदिर में होता है।

इस तरह की मूर्ति तैयार करने में कारीगरों को कई महीने लगते हैं।

इस तरह की मूर्ति तैयार करने में कारीगरों को कई महीने लगते हैं।

शंकर नगर के काली माता मंदिर समिति के सोमनाथ कर का कहना है कि 40-50 साल से हम लोग आमेर के मावठे में पानी कम होने पर भी विसर्जन किया करते थे। लेकिन बीते एक दशक से प्रशासन ने पर्यावरण और न्यायालय का हवाला देकर जलमहल और मावठे में विसर्जन पर पूरी तरह रोक लगा दी है। अब कानोता बांध का विकल्प दिया है। लेकिन वहां 400-500 बूढ़े-बच्चे और महिलाओं के साथ विसर्जन करने के दौरान जान का जोखिम बना रहता है। दो साल पहले ऐसे ही विसर्जन में दो बच्चे डूब भी चुके हैं। यही वजह है कि विसर्जन के लिए हमें शहर से 30 किमी दूर नेवता बांध जाना पड़ता है।

सोमनाथ का कहना है की उनकी दुर्गा प्रतिमाएं ईको फ्रेंडली हैं और पानी में विसर्जन के दो से तीन घंटे में घुल जाती हैं। बचा हुआ बांस और घास पानी से निकालने के लिए निगम प्रत्येक पांडाल से 10 हजार रुपए सफाई शुल्क चार्ज कर ले लेकिन हमें शहर में ही जलमहल या आमेर में विसर्जन की अनुमति दे दे। ऐसे में 30-40 हज़ार रुपए खर्च कर हमें नेवटा डैम नहीं जाना पड़ेगा और निगम की कमाई के साथ-साथ जल स्रोत भी सुरक्षित रहेगा।

बंगाल की मिट्टी से बनी खास प्रतिमा को तैयार होने के बाद धूप में सुखाते कारीगर।

बंगाल की मिट्टी से बनी खास प्रतिमा को तैयार होने के बाद धूप में सुखाते कारीगर।



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