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राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर ने रेप पीड़िता नाबालिग को गर्भपात कराने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। जस्टिस सुनील बेनीवाल की कोर्ट ने सोमवार को फैसला सुनाते हुए कहा- 29 सप्ताह (करीब 7 महीने) की प्रेग्नेंट में गर्भपात करना मां और बच्चे दोनों के लिए हा
दरअसल, एडवोकेट सपना वैष्णव की ओर से दायर इस रिट पिटिशन में रेप पीड़ित नाबालिग और उसकी मां की ओर से गर्भ गिराने की अनुमति मांगी गई थी। इस याचिका पर कोर्ट ने 28 अगस्त को आदेश कर जोधपुर के डॉ. एसएन मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल को मेडिकल बोर्ड गठित करने का जांच का निर्देश दिया था। उस समय पीड़िता 26 सप्ताह की गर्भवती थी।
मेडिकल बोर्ड ने माना- जीवित रहने में सक्षम
मेडकल बोर्ड ने 29 अगस्त को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया कि पीड़िता 29 सप्ताह की गर्भवती है और भ्रूण का वजन लगभग 1.5 किलो है। मेडिकल बोर्ड ने राय दी कि भ्रूण जीवित रहने में सक्षम है। बोर्ड ने स्पष्ट रूप से कहा- गर्भसमापन भ्रूण के जीवन के पक्ष में नहीं होगा और मां के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
जस्टिस बेनीवाल ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 की धारा 3 का विस्तृत विवरण दिया। इस कानून के अनुसार 20 सप्ताह तक एक डॉक्टर की राय से गर्भ समापन हो सकता है। 20 से 24 सप्ताह तक दो डॉक्टरों की राय जरूरी है। लेकिन, 24 सप्ताह के बाद गर्भ समापन केवल तभी संभव है, जब मेडिकल बोर्ड द्वारा भ्रूण में गंभीर असामान्यता या मां की जिंदगी को तत्काल खतरा हो।
कोर्ट ने कहा- हर स्तर पर हो देखभाल, प्राइवेसी सबसे जरूरी
जस्टिस सुनील बेनीवाल ने पीड़िता के कल्याण के लिए चीफ सेक्रेटरी (हेल्थ), सचिव, महिला एवं बाल विकास बोर्ड, सीएमएचओ जोधपुर, एमजीएच अधीक्षक, बालिका गृह अधीक्षक, डीसीपी (पश्चिम) और संबंधित थानाधिकारी के लिए विस्तृत निर्देश दिए हैं। इनमें पीड़िता की आवश्यक देखभाल, पौष्टिक भोजन और चिकित्सा सुविधा प्रदान करने, प्रसव से पहले और बाद में सभी चिकित्सा सुविधाएं बिना किसी शुल्क के उपलब्ध कराई जाएं।
कोर्ट ने कहा- यदि पीड़िता या उसके माता-पिता चाहें तो जन्म के बाद बच्चे को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को सौंपा जा सकता है। राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (RSLSA) और जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) को निर्देश दिया गया कि राजस्थान विक्टिम कंपेंसेशन स्कीम 2011 के तहत तीन महीने में उचित मुआवजा दें और यह राशि दो साल के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट में रखी जाए।
गोपनीयता का निर्देश
कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि पीड़िता की पहचान और गोपनीयता सभी स्तरों पर बनाए रखी जाए और अस्पताल में भर्ती, इलाज और प्रवेश के दौरान उसकी पहचान उजागर न की जाए।
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