नवरात्र के पांचवें दिन परिवार में सुख-सृमद्धि और संतान प्राप्ति के लिए स्कंदमाता काे पूजा जाता है, लेकिन राजस्थान में संतान काे लेकर भेदभाव बरकरार है। बेटों की चाह में यहां कई बेटियां जन्म ही नहीं ले पातीं। इसी कारण राजस्थान में जन्म के समय लिंगानुपा
शहरों में बेटियों के जन्म का आंकड़ा 940, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 879 है। जालोर की स्थिति सबसे चिंताजनक है। यहां एक हजार बेटों के मुकाबले 769 बेटियां जन्म ले रही हैं। बूंदी 803 के साथ दूसरे और उदयपुर 833 के साथ तीसरे स्थान पर है। अलवर 1127 के साथ शीर्ष पर है, बारां में 1077 और जयपुर में 915 बेटियां जन्म ले रही हैं। देश में लिंगानुपात का औसत 929 है। लक्षद्वीप 1051 के साथ शीर्ष पर, जबकि दादरा और नगर हवेली और दमन-दीव 817 के साथ सबसे नीचे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर शहरी क्षेत्रों में लिंगानुपात 924, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 931 है।

भास्कर एक्सपर्ट- एडवोकेट निधि खंडेलवाल,महिला अधिकार विशेषज्ञ
पुरुषों की बढ़ती संख्या विवाह के लिए महिलाओं की कमी को जन्म दे सकती है। इससे सामाजिक तनाव और अपराध बढ़ सकते हैं। लिंग-चयनात्मक गर्भपात महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डालता है। पीसीपीएनडीपी अधिनियम को सख्ती से लागू करना चाहिए। लड़कियों के जन्म पर उत्सव को बढ़ावा देने और महिलाओं के लिए आर्थिक अवसर सृजित करने चाहिए। महिलाओं के लिए सुलभ और सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
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