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हरा-भरा बनाने के लिए सरकार ने जो महत्त्वाकांक्षी पौधशाला योजना शुरू की थी, वह झुंझुनूं जिले में पूरी तरह असफल साबित हुई है। करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद जिले की अधिकांश ग्राम पंचायतों में पौधशालाएं या तो बनी ही नहीं, और जहां बनीं भी वहां पानी और

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पंचायती राज विभाग ने महात्मा गांधी नरेगा योजना के तहत जिले की 329 ग्राम पंचायतों में पौधशाला विकसित करने का लक्ष्य रखा था। इनमें से 314 पंचायतों को 7 करोड़ 67 लाख 16 हजार रुपए की स्वीकृति भी दी गई। योजना का उद्देश्य था कि हर पंचायत पांच हजार पौधे तैयार करे और अगले पांच साल में हरियाली का ऐसा जाल बिछे कि जिले का चेहरा बदल जाए। लेकिन परिणाम उम्मीदों के विपरीत रहे।

लुटू ग्राम पंचायत की पौधशाला में सूख चुके पौधों के ढेर, पानी और देखभाल के अभाव ने बर्बाद कर दिया करोड़ों का सपना।

लुटू ग्राम पंचायत की पौधशाला में सूख चुके पौधों के ढेर, पानी और देखभाल के अभाव ने बर्बाद कर दिया करोड़ों का सपना।

शुरुआत से ही कमजोर रही योजना

योजना की शुरुआत में ही कई कमियां दिखने लगीं। जिन पंचायतों को बजट मिला, उनमें से अधिकांश ने न तो जगह का सही चयन किया और न ही पानी की व्यवस्था। कुछ पंचायतों ने खेतों के बीच या सुनसान मैदानों में पौधशालाएं बना दीं, जहां न बाड़बंदी थी और न ही कोई देखभाल करने वाला।

लुटू ग्राम पंचायत में तो हाल और भी खराब रहे। यहां पौधशाला तो बनाई गई, लेकिन देखभाल के अभाव और पानी की कमी से पौधे सूखने लगे। हालात इतने बिगड़े कि कई जगह पौधों के ढेर ही जला दिए गए। ग्रामीणों का कहना है कि अगर शुरुआती समय में देखभाल और सिंचाई की व्यवस्था होती तो हजारों पौधे आज हरे-भरे होते।

झटावा खुर्द पंचायत की पौधशाला—कागजों पर हरी-भरी, जमीन पर सिर्फ वीरानी और टूटे गमले।

झटावा खुर्द पंचायत की पौधशाला—कागजों पर हरी-भरी, जमीन पर सिर्फ वीरानी और टूटे गमले।

झटावा खुर्द ग्राम पंचायत की पौधशाला भी कागजों पर ही हरी-भरी दिखती है। वास्तविकता यह है कि वहां आज सिर्फ सूखे गमले और टूटी हुई नर्सरी बैग पड़ी हैं। पौधशाला का पूरा परिसर वीरान पड़ा है। ग्रामीणों के अनुसार शुरुआती बरसात में पौधे लगाए तो गए थे, लेकिन बाद में किसी ने ध्यान नहीं दिया। न तो पानी का इंतजाम हुआ और न ही चौकीदार रखा गया।

निगरानी का तंत्र भी नाकाम

जिले में इस योजना की निगरानी के लिए ग्राम विकास अधिकारी से लेकर अधीक्षण अभियंता तक को नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया। काम की समीक्षा के लिए प्लांटेशन आईडी तक बनाई गई। लेकिन यह पूरा तंत्र केवल कागजों तक सीमित रहा। पंचायतों को बजट मिला, काम का रिकॉर्ड तैयार हुआ, लेकिन स्थलीय निरीक्षण और देखभाल में लापरवाही होती रही।

निगरानी तंत्र की नाकामी—जिले में पौधशालाओं की हालत देखकर मायूस ग्रामीण।

निगरानी तंत्र की नाकामी—जिले में पौधशालाओं की हालत देखकर मायूस ग्रामीण।

झुंझुनूं जिला परिषद के अधिशाषी अभियंता विजेंद्र ढाका का कहना है कि “ग्राम पंचायतों में पौधशालाएं स्थापित की गई थीं, लेकिन उनकी वर्तमान स्थिति मेरी जानकारी में नहीं है।” उनका यह बयान साफ बताता है कि मॉनिटरिंग व्यवस्था कितनी लचर रही।

सूख गए पौधे, गांव के लोग मायूस

योजना की विफलता का असर सीधे गांवों पर पड़ा। गांवों के लोगों ने उम्मीद की थी कि पौधशालाओं से उन्हें औषधीय और फलदार पौधे आसानी से मिलेंगे। लेकिन ज्यादातर पंचायतों में सूखे पौधों और खाली गड्ढों के अलावा कुछ नहीं बचा।

जली हुई टहनियां और राख—लुटू पंचायत में पौधशाला योजना की असफलता की गवाही।

जली हुई टहनियां और राख—लुटू पंचायत में पौधशाला योजना की असफलता की गवाही।

लुटू पंचायत के ग्रामीणों का कहना है कि सरकार ने बड़े-बड़े दावे किए थे। पौधशाला में हजारों पौधे तैयार होने थे, लेकिन अब वहां जली हुई टहनियां और राख ही नजर आती है। गांव की महिलाओं ने बताया कि बच्चों के लिए फलदार पौधे लगाने का सपना अधूरा रह गया।

झटावा खुर्द पंचायत के लोग भी मायूस हैं। उनका कहना है कि जिस जगह पौधशाला बनाई गई थी, वहां आज खरपतवार और झाड़ियां उग आई हैं। न पौधे हैं, न पानी की टंकी और न ही कोई चौकीदार। “शुरुआत में मजदूरों से गड्ढे खुदवाए गए, पौधे लगाए गए, फोटो खिंचवाई गई, और फिर सब कुछ ठप हो गया,” ग्रामीण बताते हैं।

बीज बैंक का वादा भी अधूरा

योजना का एक अहम हिस्सा था—ग्राम पंचायत स्तर पर बीज बैंक बनाना। ग्रामीणों से कहा गया था कि वे आम, जामुन, पपीता जैसे फलों के बीज दान करें और उनसे पौधे तैयार हों। लेकिन झुंझुनूं जिले में एक भी पंचायत में यह बीज बैंक धरातल पर नहीं बन पाया। ग्रामीण बताते हैं कि बीज बैंक का नाम तो कई बार सुना, लेकिन कभी किसी को बीज जमा कराते नहीं देखा।

पौधशालाओं के उजड़े परिसर में खरपतवार और झाड़ियां, हरियाली का सपना अधूरा रह गया।

पौधशालाओं के उजड़े परिसर में खरपतवार और झाड़ियां, हरियाली का सपना अधूरा रह गया।

पैसे खर्च, पर काम अधूरा

प्रत्येक पंचायत को लाखों रुपए का बजट दिया गया था। शर्त यह थी कि पौधे कम से कम तीन साल तक सुरक्षित रहें। लेकिन जब जगह का सही चयन, पानी की आपूर्ति और सुरक्षा व्यवस्था ही नहीं हो पाई, तो बजट का फायदा जमीन पर दिखाई नहीं दिया।

पंचायतों में बजट का उपयोग गड्ढे खुदवाने, पौधे खरीदने और नर्सरी बैग भरने तक ही सिमट गया। बाद की देखभाल के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई। नतीजतन पौधशालाएं शुरू होते ही सूख गईं।

हरियाली का सपना अधूरा

झुंझुनूं जैसे शुष्क जिले के लिए हरियाली केवल सुंदरता नहीं बल्कि जीवन का आधार है। खेती, पशुपालन और पर्यावरण संतुलन सब कुछ हरियाली पर टिका है। पौधशाला योजना का उद्देश्य था कि गांव आत्मनिर्भर हों और पौधों की कमी कभी न हो। लेकिन करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद यह सपना अधूरा रह गया।



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