उदयपुर में शुरू हुए नेशनल ट्राईबल फूड फेस्टिवल में अलग-अलग राज्याें के व्यंजन बनाए जा रहे है।
आप उदयपुर में है तो आपको देश के अलग-अलग राज्यों के व्यंजनों का स्वाद मिल जाएगा और वह भी आदिवासी परिवारों के वहां बनाई जाने वाली डिशेज है। आप को बिल्कुल देसी अंदाज में बनते हुए व्यंजन दिखेंगे और हाथों हाथ आप भर पेट खा भी सकते है।
शहर के बीच स्थित नगर निगम परिसर में कहीं चूल्हे पर मिट्टी के बर्तनों में दाल-सब्जी पक रही हैं, तो कहीं ढाक के पतों के बीच मक्की के पानिये पक रहे हैं। रागी, कोदरा, वटी जैसे मोटे अनाजों के व्यंजनों और महुआ के फुलों के ढोकले और लड्डू का चटकारा मिल रहा है तो बांस की सब्जी चखने के लिए होड़ सी मच रही है।

महाराष्ट्र का एक व्यंजन अनारसे।
यह सब उदयपुर में एक फेस्टिवल की एक तस्वीर है। यहां पर तीन दिवसीय नेशनल ट्राईबल फूड फेस्टिवल-2025 का आज आगाज हुआ है।
जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग एवं माणिक्यलाल वर्मा आदिम जाति शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान (टीआरआई) के तत्वावधान में नेशनल ट्राईबल फूड फेस्टिवल का शुभारंभ बुधवार को नगर निगम परिसर में जनजाति क्षेत्रीय विकास मंत्री बाबूलाल खराड़ी के मुख्य आतिथ्य में हुआ। विशिष्ट अतिथि उदयपुर शहर विधायक ताराचंद जैन एवं उदयपुर ग्रामीण विधायक फूलसिंह मीणा थे।
उद्घाटन समारोह में मंत्री बाबूलाल खराड़ी ने कहा कि यह फेस्टिवल व्यंजनों के स्वाद के साथ सांस्कृतिक संगम का भी सुअवसर है। इसके माध्यम से लोग एक दूसरे की संस्कृति को जान सकेंगे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक भारत-श्रेष्ठ भारत के लक्ष्य को लेकर चल रहे हैं। इसी क्रम में यह आयोजन हो रहे हैं।
केबिनेट मंत्री ने पारंपरिक खान-पान का जिक्र करते हुए कहा कि हमारे पूर्वजों का भोजन और दिनचर्या स्वास्थ्यवर्धक थी, इसलिए लोग बीमार कम होते थे, लेकिन अब खान-पान में आए बदलाव और विकृतियों के चलते स्वास्थ्य संबंधी शिकायतें ज्यादा होने लगी हैं। उन्हांने परंपरागत खाद्य प्रणाली को अपनाने का भी आह्वान किया।

कार्यक्रम में जनजाति बालिकाओं ने प्रस्तुतियां दी।
प्रारंभ में निदेशक ओपी जैन ने अतिथियों का स्वागत करते हुए आयोजन की जानकारी दी। कार्यक्रम में जनजाति बालिकाओं ने नृत्य, गीत आदि की प्रस्तुतियां भी दी। टीएडी उपायुक्त कृष्णपालसिंह चौहान, जितेंद्र पाण्डे, निदेशक सांख्यिकी सुधीर दवे सहित अधिकारी एवं विभिन्न क्षेत्रों से आए कलाकार उपस्थित रहे। संचालन अतिरिक्त जिला शिक्षाधिकारी टीएडी डॉ अमृता दाधीच ने किया।
डाइनिंग एरिया भी बनाया फेस्टिवल में राजस्थान सहित देश के 7 राज्यों से जनजाति समाज के पाक कलाकार भाग लेकर अपने-अपने क्षेत्र के विशिष्ट परंपरागत जनजाति व्यंजन तैयार कर प्रदर्शित कर रहे हैं। फेस्टिवल में प्रवेश पूरी तरह से निःशुल्क है। आमजन स्टाल्स पर अपनी पसंद कें हिसाब से खाद्य सामग्री खरीद कर उसका लुत्फ उठा सकते हैं। आयोजन स्थल पर व्यंजनों का आनंद लेने के लिए डाइनिंग एरिया की भी व्यवस्था रखी गई है।

दादर एवं नागर हवेली की नागली रोटी।
इन व्यंजनों का मिल रहा लुत्फ
- महाराष्ट्र के महादेव कोली जनजाति के मासवडी, डांगर भाकरी, कड़क माकरी
- मध्यप्रदेश से बारेला, बेगा, मलासी जनजाति द्वारा लाल ज्वारी के लड्डू, जंगली मौसंबी भाजी, कुटकी भात
- जम्मू कश्मीर से गुज्जर जनजाति द्वारा कद्दू खीर, कुंगी मुकुम
- दादर एवं नगर हवेली से माण्डोनी जनजाति द्वारा बेम्बू अचार, नागली रोटी, मोरींगा भाजी
- छत्तीसगढ़ से हालना एवं मुरीया जनजाति द्वारा मंडिया रोटी, आमल, चापड़ा चटनी
- गुजरात से घोड़िया जनजाति द्वारा नागली से तैयार विभिन्न व्यंजन
- राजस्थान के विभिन्न जनजाति बहुल जिलों से भील, मीणा, गरासिया एवं सहरिया जनजाति के पाक कलाकारों द्वाना कुलध की घूघरी, मक्के का खींचड़ा, मक्की राब व लापसी, कुआर, किकोड़े की भाजी, बाजरा राब, बाजरी का सोगरा, महुआ के ढेकले, महुआ के लड्डू, पानिया, केर सांगरी (पंचकुटा)

महाराष्ट्र का एक व्यंजन।
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