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प्रतापगढ़ के बम्बोरी के देवनारायण मंदिर में रविवार को गवरी नृत्य का आयोजन किया गया। नरसाखेड़ी मगलवाड़ से आए 27 कलाकारों ने विभिन्न प्रस्तुतियां दीं। नन्द लाल, सोनू चितोड़, उदयलाल सालेडा और नारायण धोलादाता ने कॉमेडी से दर्शकों का मनोरंजन किया।

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कलाकारों ने राजा-रानी, मीणा बजारा लड़ाई, हटीया दानव, कालू किर, काना गुजरी और खेतु के खेल प्रस्तुत किए। यह उत्सव रक्षाबंधन के दूसरे दिन से शुरू होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में ढोल की थाप और पारंपरिक वेशभूषा में सजे कलाकारों के साथ इसे मनाया जाता है।

भगवान शिव और माता पार्वती की लोककथाओं पर आधारित गवरी नृत्य क्षेत्र में समृद्धि और अच्छी फसल के लिए किया जाता है। सवा महीने तक चलने वाले इस सांस्कृतिक पर्व में कलाकार कठोर नियमों का पालन करते हैं। वे ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। जूते नहीं पहनते और एक समय भोजन करते हैं। हरी सब्जियां नहीं खाते और जमीन पर सोते हैं।

गवरी नृत्य समाज में सकारात्मक बदलाव का माध्यम है। कलाकार महिला सशक्तीकरण, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करते हैं। यह मेवाड़ की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और भील जनजाति की परंपरागत आस्थाओं को दर्शाता है। आधुनिकता की दौड़ में यह सांस्कृतिक पहचान को बचाने का प्रयास है।

अंतिम दिन रात को विशेष मंचन होता है, जिसे गवरी की अग्नि परीक्षा कहा जाता है। इस आयोजन में गांव के सभी महिला-पुरुष भाग लेते हैं। यह उत्सव सामाजिक एकता और समरसता को बढ़ावा देता है।



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