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जन्माष्टमी की सुबह है। पूरे राजस्थान में मंदिरों की घंटियां गूंज रही हैं। नाथद्वारा में श्रीनाथजी की हवेली जगमगा रही है&फूलों, श्रृंगार और भजन-संगीत से। लेकिन भीड़ में खड़े ज्यादातर भक्तों को यह नहीं पता कि आज से दो सौ साल पहले श्रीनाथजी पांच साल तक

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घसियार मंदिर, जहां श्रीनाथ जी के चित्र की पूजा की जाती है।

घसियार मंदिर, जहां श्रीनाथ जी के चित्र की पूजा की जाती है।

औरंगजेब के दौर से शुरू हुई यात्रा

मीरा कन्या महाविद्यालय, उदयपुर के प्रोफेसर और इतिहासकार डॉ. चंद्रशेखर शर्मा बताते हैं-कहानी की शुरुआत महाराणा राजसिंह प्रथम के समय से होती है। तब मुगल बादशाह औरंगजेब का मूर्तिभंजन अभियान चल रहा था। उत्तर प्रदेश के मंदिरों में मूर्तियां तोड़ने की धमकियां मिल रही थीं। इसी दौरान श्रीनाथजी के पुजारी दामोदर दास ने मूर्ति को वहाँ से निकालकर सिहाड़ (आज का नाथद्वारा) पहुंचाया और मंदिर की स्थापना की।

मराठा खतरे और घसियार की तैयारी

कुछ समय बाद मराठा सेनापति जसवन्तराव होल्कर प्रतापगढ़ पहुंचा और नाथद्वारा को चिट्ठी लिखकर धमकी दी-श्रीनाथजी को लूटेंगे। उस समय नाथद्वारा के तिलकायत भीम सिंह थे। उन्होंने मूर्ति की सुरक्षा के लिए घसेर (आज का घसियार) में नया मंदिर बनाने की तैयारियां शुरू कर दीं।

लेकिन मंदिर बनने से पहले ही पहाड़ियों के बीच मराठा हमला हो गया। तब भीम सिंह ने श्रीनाथजी को नाथद्वारा हवेली में सुरक्षित रखा, जहां वे करीब दस महीने तक रहे।

ये पहाड़ियों के बीच बना स्थान है। यहां नाथद्वारा की तरह ही सेवा-पूजा होती है।

ये पहाड़ियों के बीच बना स्थान है। यहां नाथद्वारा की तरह ही सेवा-पूजा होती है।

पांच साल का घसियार प्रवास

जब घसियार मंदिर तैयार हुआ, तो 1802 ईसवी में श्रीनाथजी को वहां विराजमान कराया गया। अगले पांच साल (1802–1807) तक भगवान यहीं रहे। इस दौरान जसवन्तराव ने लूटपाट की और बारह लाख रुपए की मांग रखी।

जब हालात सामान्य हुए, तो श्रीनाथजी को घसियार से नाथद्वारा के उसी मूल मंदिर में वापस ले जाया गया।

आज भी वही परंपरा

डॉ. चंद्रशेखर बताते हैं-आज भी घसियार मंदिर में नाथद्वारा जैसी ही परंपरा निभाई जाती है। यहां चित्र सेवा होती है, जिसमें ठाकुरजी का श्रृंगार कर भक्तों को दर्शन कराए जाते हैं।

इस मंदिर की खास पहचान है-श्रीनाथजी के पैर आगे की ओर खुले हुए हैं। मान्यता है कि जब तिलकायत गिरधर जी ने ठाकुरजी को शरण में धोक देना चाहा, तब भगवान ने अपने चरण आगे बढ़ा दिए।

मंदिर परिसर में बनी गौशाला। इसका पूरा मैनेजमेंट नाथद्वारा मंदिर बोर्ड के पास है।

मंदिर परिसर में बनी गौशाला। इसका पूरा मैनेजमेंट नाथद्वारा मंदिर बोर्ड के पास है।

मंदिर का मैनेजमेंट नाथद्वारा मंदिर बोर्ड के पास

वर्तमान में घसियार मंदिर में जीर्णोद्धार चल रहा है। इसका प्रबंधन नाथद्वारा मंदिर बोर्ड के पास है। मंदिर परिसर में एक गौशाला भी है।

उदयपुर, रणकपुर, खमनोर, कुंभलगढ़ और नाथद्वारा आने वाले पर्यटक और भक्त पिंडवाड़ा हाईवे से गुजरते समय घसियार में भी भगवान के दर्शन करते हैं-जहां कभी श्रीनाथजी ने पांच साल का प्रवास किया था।



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