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मेडिकल कॉलेज से अटैच बीडीके अस्पताल में नहीं सेंट्रल लैब

झुंझुनूं जिले का सबसे बड़ा और सबसे व्यस्त अस्पताल बीडीके मेडिकल कॉलेज से जुड़ा हुआ होने के बावजूद जांच सुविधाओं में पिछड़ा हुआ है। हर दिन यहां औसतन 1700 से अधिक मरीजों को खून और मूत्र की जांच करानी होती है, लेकिन अस्पताल में आज तक सेंट्रल लैब स्थापित

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मरीजों की मजबूरी: हायर सेंटर या निजी जांच केंद्र

बीमारी गंभीर हो या विशेष जांच की जरूरत पड़े, बीडीके आने वाले मरीजों के पास दो ही विकल्प बचते हैं—या तो जयपुर जैसे हायर सेंटर का रुख करें या फिर महंगे निजी जांच केंद्रों का। हार्मोनल टेस्ट, कैंसर स्क्रीनिंग, हार्ट और लंग्स से जुड़ी विशेष जांच, ब्लड व यूरीन कल्चर जैसी मूलभूत सुविधाएं यहां उपलब्ध नहीं हैं। नतीजा यह कि हजारों मरीज हर माह निजी पैथोलॉजी लैब की ओर मुड़ते हैं और अपनी जेब पर भारी बोझ डालते हैं।

आईडीएसपी लैब भी छिन गई

बीडीके अस्पताल में 2015 में आईडीएसपी लैब स्थापित की गई थी। मौसमी बीमारियों और नई तरह के संक्रमणों की जांच के लिए बनी यह सुविधा लंबे समय तक जिले को राहत देती रही। लेकिन 2023 में इस लैब को नवलगढ़ जिला अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया। यही नहीं, बीडीके से जुड़ी कई अन्य सुविधाएं भी धीरे-धीरे नवलगढ़ स्थानांतरित कर दी गईं।

आईपीएचयू लैब भी नवलगढ़, जबकि ओपीडी आधी

आज स्थिति यह है कि नवलगढ़ जिला अस्पताल में आईडीएसपी के बाद आईपीएचयू लैब भी संचालित हो रही है। लेकिन विडंबना यह है कि नवलगढ़ में ओपीडी महज 1400 से 1500 मरीज प्रतिदिन रहती है, जबकि बीडीके अस्पताल की ओपीडी 3200 से 3500 मरीजों तक पहुंच जाती है। यानी बीडीके की मरीज संख्या दोगुनी होने के बावजूद जांच सुविधाएं नवलगढ़ को प्राथमिकता देकर वहां विकसित कर दी गईं।

लैब तो हैं, लेकिन सेंट्रल लैब नहीं

अस्पताल के कमरा नंबर 73, 74 और 77 में छोटे स्तर पर लैब चलाई जा रही हैं। तकनीशियन और पैथोलॉजिस्ट की संख्या पर्याप्त होने के बावजूद उपकरणों की कमी और सेंट्रल लैब न होने से जांच अधूरी रह जाती है। यहां स्थापित आरटीपीसीआर लैब भी सिर्फ एक हॉल में चल रही है, जो कोविड काल के दौरान स्थापित की गई थी।

मेडिकल कॉलेज शुरू होने के बाद उलटी गिनती

चिकित्सा विभाग का तर्क है कि मेडिकल कॉलेज स्थापित हो चुका है, इसलिए जिलास्तरीय जांच सुविधाएं नवलगढ़ में स्थानांतरित कर दी गईं। लेकिन मेडिकल कॉलेज से अटैच बीडीके अस्पताल में अब तक प्रोफाइल टेस्ट, जेनेटिक टेस्ट और फंक्शन टेस्ट जैसी जरूरी जांच शुरू नहीं हो पाई हैं। हालत यह है कि विटामिन बी-12, थाइराइड, फॉलिक एसिड, टॉर्च प्रोफाइल, एचबीए-1सी जैसे सामान्य टेस्ट भी बीडीके में नहीं हो रहे।

40 तरह की जांचों के लिए मरीजों को जयपुर भेजा जाता है

बायोप्सी, कैंसर टेस्ट, हार्मोनल जांच, लिवर, किडनी और हार्ट से जुड़ी विशेष स्क्रीनिंग जैसी करीब 40 तरह की जांचें बीडीके में संभव ही नहीं। ऐसे मामलों में सीधे जयपुर एसएमएस अस्पताल रेफर किया जाता है। दूरदराज से आने वाले गरीब मरीजों के लिए यह न केवल समय गंवाने वाली प्रक्रिया है, बल्कि आर्थिक बोझ भी बढ़ाता है।

मेडिकल कॉलेज अस्पताल में जांच की न्यूनतम जरूरतें

सामान्यत: मेडिकल कॉलेज स्तर के अस्पतालों में रक्त व मूत्र परीक्षण, इमेजिंग जांच, सीटी स्कैन, ईसीजी, जेनेटिक टेस्ट, हिस्टोपैथोलॉजी, कल्चर टेस्ट, थायराइड प्रोफाइल, पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट जैसी दर्जनों सुविधाएं अनिवार्य होती हैं। लेकिन बीडीके में इनमें से अधिकांश उपलब्ध नहीं हैं।

बीपीएचयू लैब प्रस्ताव अब तक स्वीकृति से दूर

स्थिति सुधारने के लिए बीडीके अस्पताल में बीपीएचयू (ब्लॉक पब्लिक हेल्थ यूनिट) लैब का प्रस्ताव भेजा गया था। लेकिन यह प्रस्ताव अब तक स्वीकृति के लिए अटका पड़ा है। प्रस्ताव पास होते ही गंभीर बीमारियों की विशेष जांचें स्थानीय स्तर पर संभव हो सकती हैं। फिलहाल मरीजों को सिर्फ आश्वासन ही दिया जा रहा है।

पीएमओ का कहना

बीडीके अस्पताल के पीएमओ डॉ. जितेंद्र भांबू का कहना है कि मेडिकल कॉलेज बनने के बाद जिलास्तरीय लैब नवलगढ़ में है। बीडीके में अधिकतर जांचें की जा रही हैं, केवल कुछ विशेष जांचों के लिए मरीजों को हायर सेंटर भेजना पड़ता है। बीपीएचयू लैब का प्रस्ताव भेजा हुआ है और जल्द ही सुविधा शुरू होने की उम्मीद है।



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