बाड़मेर सांसद उम्मेदाराम बेनीवाल ने संसद मनरेगा स्कीम के राज्य के 3800 करोड़ की राशि लंबित होने का मुद्दा उठाया। सरकार का ध्यान इस मुद्दे की ओर आकर्षित करते हुए तत्काल कार्रवाई करने की मांग की। बाड़मेर जिले में 725 करोड़ और जैसलमेर के 277 करोड़ का भुगतान
3800 करोड़ के लंबित भुगतान का मामला
उम्मेदाराम बेनीवाल ने संसद में नियम 377 के अंतर्गत महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत राजस्थान का केंद्र में 3800 करोड़ के लंबित भुगतानों की गंभीर समस्या को उठाया। उन्होंने ग्रामीण विकास मंत्रालय और भारत सरकार का ध्यान इस ज्वलंत मुद्दे की ओर आकर्षित करते हुए तत्काल कार्रवाई की मांग की है। बेनीवाल ने कहा- मनरेगा 2025 में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. डॉ. मनमोहन की सरकार की ओर से शुरू की गई। इसका उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को 100 दिन का रोजगार सुनिश्चित करने, गरीबी व बेरोजगारी को कम करना। यह स्कीम आज भी देश के गांव-ढाणी के लोगों की जीवन रेखा बनी हुई है।

बेनीवाल ने हस्तक्षेप करने की मांग।
बाड़मेर में 725 करोड़, जैसलमेर जिले में 277 करोड़ राशि का भुगतान लंबित
सांसद उम्मेदाराम बेनीवाल ने कहा- अकेले बाड़मेर-बालोतरा जिलो की 725 करोड़ और जैसलमेर जिले की 277 करोड़ राशि का भुगतान लंबित हैं। सांसद ने सदन में बताया कि राजस्थान में मनरेगा के तहत वित्तीय वर्ष 2022-23 के कई बिल ग्राम पंचायतों में जांच के अभाव में रुके हैं। जबकि 2023-24 के अधिकांश कार्यों के बिल पोर्टल पर अपलोड होने के बावजूद केवल 20% भुगतान ही हुआ है। सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि चालू वित्तीय वर्ष 2024-25 में अभी तक एक भी भुगतान जारी नहीं हुआ। इस देरी ने मेट कारीगरों और सामग्री सप्लाई कर्ता को आर्थिक संकट में धकेल दिया है, जिन्होंने निजी राशि लेकर कार्य पूरे किए थे। कई सप्लाईकर्ता के ऋण अब डिफॉल्ट की स्थिति में हैं। जिससे उनकी आर्थिक स्थिति चरमराई हुई है।
देरी से चरमराई ग्रामीण अर्थव्यवस्था
सांसद बेनीवाल ने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए कहा कि भुगतान में देरी के कारण न केवल विकास कार्य ठप पड़े हैं, बल्कि मेट कारीगरों और सामग्री आपूर्तिकर्ताओं की आर्थिक स्थिति भी बुरी तरह चरमरा गई है। केंद्र सरकार से आग्रह किया कि राजस्थान सहित बाड़मेर-जैसलमेर जिलो के लंबित भुगतानों को शीघ्र जारी किया जाए। मनरेगा ग्रामीण भारत को सशक्त बनाने का आधार स्तंभ है, और इसकी विफलता सरकार की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाती है।
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