जवाहर कला केंद्र में जारी 28वें लोकरंग महोत्सव के दूसरे दिन बुधवार को मध्यवर्ती के मंच पर लोक संस्कृति और नृत्य-ताल का अद्भुत संयोजन दिखा।
जवाहर कला केंद्र में जारी 28वें लोकरंग महोत्सव के दूसरे दिन बुधवार को मध्यवर्ती के मंच पर लोक संस्कृति और नृत्य-ताल का अद्भुत संयोजन दिखा। देश के कोने-कोने से आए लोक कलाकारों ने अपनी-अपनी सांस्कृतिक परंपराओं की अनूठी झलक प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रम
दूसरे दिन पर 8 राज्यों के कलाकारों ने विभिन्न नृत्य शैलियों पर आधारित 14 प्रस्तुतियां दी। 28वां लोकरंग महोत्सव लोक संस्कृति की छवियों से सराबोर होकर 17 अक्टूबर तक अपनी रंग-बिरंगी परंपरा को आगे बढ़ाता रहेगा।

सहरिया नृत्य ने जनजातीय जीवन की सहजता और सामूहिक आनंद को दर्शाया।
कार्यक्रम की शुरुआत राजस्थान के श्रवण गेगावत ने पारंपरिक मशक वादन प्रस्तुत करके की, जिसमें उन्होंने लोकधुनें बजाईं। इसके बाद मिजोरम का चैरो नृत्य मंच पर साकार हुआ, जिसमें बांस की छड़ों की थाप पर नर्तकों की लयबद्ध गतियों ने दर्शकों को मोह लिया।
राजस्थान के बाबूलाल व समूह के कलाकारों ने ऊर्जामय आंगी गैर नृत्य प्रस्तुत किया, जिसमें घूमर जैसी गोल घुमावदार मुद्राएं और ढोल-नगाड़ों की गूंज ने मरुधर की वीर-रस भरी संस्कृति को जीवंत किया। वहीं मणिपुर का मणिपुरी रास अपने भक्ति और कोमलता से परिपूर्ण भावों के साथ मंच पर उतरा, जिसने ‘कृष्ण-राधा प्रेम’ की अमर कथा को नृत्य में पिरोया।

असम का झूमूर नृत्य ‘टी ट्राइब्स’ की श्रमशील संस्कृति और उल्लास का प्रतीक रहा, मदल की लय पर कलाकारों ने खेतों और चाय बागानों के जीवन की झलक दिखाई।
अमित गमेती व समूह द्वारा प्रस्तुत राजस्थान का गवरी नृत्य अपनी पौराणिक कथाओं और देव-लोक परंपराओं की झलकियों से दर्शकों को आध्यात्मिक अनुभव कराता रहा। हिमाचल प्रदेश से आए समूह ने ‘स्वांगटी गी’ तथा दीपक नृत्य प्रस्तुत किया जो हाटी समुदाय द्वारा शरद ऋतु में मनाए जाने वाले उत्सवों का अभिन्न हिस्सा है।
सिर पर जलते दीपक के पात्र रखकर नर्तक जब बिजट और रेणुका माता के भजनों पर साष्टांग प्रणाम करते हैं, तो दृश्य दिव्यता से भर उठता है।

राजस्थान का गवरी नृत्य अपनी पौराणिक कथाओं और देव-लोक परंपराओं की झलकियों से दर्शकों को आध्यात्मिक अनुभव कराता रहा।
जम्मू-कश्मीर से आए 15 सदस्यीय दल ने बच्च नगमा की रंगीन प्रस्तुति दी, यह पारंपरिक लोकनाट्य किशोर कलाकारों द्वारा स्त्री वेश में किया जाता है। उन्होंने इस प्रस्तुति में रबाब, मटका, तुमखनारी और हारमोनियम से संगत की जिसकी धुनों पर यह नृत्य विवाह और त्यौहारों की खुशियों को दर्शाता है।
इसके बाद मणिपुर का पुंग चोलम और ढ़ोललचोलम नृत्य हुआ, जहां ढोल की लय और घूमते हुए कलाकारों की अद्भुत तालमेल ने मंच को रोमांचित कर दिया। असम का झूमूर नृत्य ‘टी ट्राइब्स’ की श्रमशील संस्कृति और उल्लास का प्रतीक रहा, मदल की लय पर कलाकारों ने खेतों और चाय बागानों के जीवन की झलक दिखाई।

मणिपुर का पुंग चोलम और ढ़ोललचोलम नृत्य हुआ, जहां ढोल की लय और घूमते हुए कलाकारों की अद्भुत तालमेल ने मंच को रोमांचित कर दिया।
उत्तराखंड की छपेली अपनी सरलता और स्नेहिल अभिव्यक्ति के लिए सराही गई, जबकि राजस्थान के तिलकराज धानुक द्वारा सहरिया नृत्य ने जनजातीय जीवन की सहजता और सामूहिक आनंद को दर्शाया। आखिर में पंजाब के जिंदवा नृत्य ने पूरे उत्साह के साथ मंच पर प्रस्तुति दी। जिसमें ढोल, अल्गोजा, चिमटा और सिक्के की झंकार के साथ प्रेम और भावनाओं की कहानी कहते इस नृत्य ने दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया।
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