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सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारी सोनिका पुरोहित को राहत देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें हाईकोर्ट ने न्यायिक अधिकारी को फैसला लिखने की ट्रैनिंग देने का आदेश दिया था।
जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस विजय विश्नोई की बैंच ने यह आदेश न्यायिक अधिकारी की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए दिए। साथ ही अदालत ने सरकार को इस मामले में चार सप्ताह में जवाब पेश करने का निर्देश भी दिया।
जज ने कट, कॉपी, पेस्ट सिद्धांत का सहारा लिया दरअसल, यह पूरा मामला झुंझुनूं जिले के मलसीसर थाने में दर्ज पोक्सो केस से जुड़ा हैं। झुंझुनूं पोक्सो कोर्ट की पीठासीन अधिकारी सोनल पुरोहित ने एक एफआईआर में दर्ज दो आरोपियों को अलग-अलग मुकदमों में रेप का दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।
सजा के खिलाफ एक आरोपी की अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि एक आरोपी के फैसले में दिए गए तर्क का बड़ा हिस्सा सह-अभियुक्त के फैसले में दिए गे तर्कों से मिलता-जुलता हैं।
इस पर हाईकोर्ट जस्टिस अशोक कुमार जैन ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह एक चिंताजनक स्थिति है कि पॉक्सो न्यायालय में तैनात एक वरिष्ठ जिला न्यायाधीश फैसला लिखने के लिए समय नहीं दे रहे हैं, बल्कि एक स्टेनोग्राफर पर निर्भर हैं। एक न्यायाधीश का कर्तव्य है कि वह ऊपर से नीचे तक फैसला लिखवाएं।
जबकि यहां न्यायाधीश ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए कट, कॉपी, पेस्ट सिद्धांत का सहारा लिया। इसलिए राजस्थान न्यायिक अकादमी को निर्देश दिया जाता है कि वह न्यायाधीश को जजमेंट लेखन का प्रशिक्षण दें। वहीं, यह टिप्पणी न्यायाधीश की एसीआर में शामिल की जाए।
लिपिकीय गलतियां थी अपील में न्यायिक अधिकारी की ओर से कहा गया कि फैसले में अनजाने में लिपिकीय गलतियां हो गई थी। जैसे कि अभियोजन पक्ष के गवाह का गलत क्रमांक, जबकि गवाही की विषय-वस्तु और सार सही-सही दर्ज किए गए थे।
फैसले में त्थात्मक और कानूनी रूप से कोई कमी नहीं थी। इसलिए ही, हाईकोर्ट ने आरोपी की सजा को निलंबित करने से इनकार करते हुए दोषसिद्धि को बरकरार रखा। लेकिन उनके खिलाफ की गई टिप्पणियां अनावश्यक रूप से कठोर थी। जिन्हें रद्द किया जाना चाहिए।
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