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जयपुर के एसएमएस अस्पताल के ट्रॉमा सेंटर में आग लगने के बाद दम घुटने और बर्न केस होने से आठ लोगों की मौत हो गई। आग लगने की घटना के बाद समय पर न तो उसे बुझाया गया न ही समय पर इसकी जानकारी स्टाफ को लगी। उपकरण काम नहीं कर रहे थे ऐसी बात सामने आई है जिसके

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ये इंतजाम जरूरी है राकेश व्यास ने बताया कि जहां जान माल नुकसान की संभावना होती है वहां पर अग्निशमन से बचाव के पुख्ता बंदोबस्त जरूरी है। सरकारी अस्पतालों में सरकार की तरफ से व्यस्था की जाती है। हालांकि इनका भी क्वाटरली या हाफ ईयरली मॉक ड्रिल के जरिये निरीक्षण होना चाहिए कि उपकरण काम कर रहे हैं या नहीं कर रहे है। स्मोक डिटेक्टर आग लगने की कड़ी में सबसे पहले अलार्म देता है तो इसका ठीक तरह से काम करना जरूरी है। टोपोग्राफी क्लियर होनी चाहिए कि एंट्री और एग्जिट में कोई अवरोध न हो। इमरजेंसी के लिए अलग से एग्जिट की व्यवस्था होनी चाहिए। इन सबको चैक करवाया जाएगा और जहां कोई कमी नजर आएगी उसे दूर करवाएंगे।

साल भर में हो फायर ऑडिट अग्निशमन विभाग से जुडे सूत्रों ने बताया कि अभी दो साल में अस्पतालों के फायर ऑडिट का नियम है। अस्पतालों को दो साल की एनओसी मिलती है। जबकि अस्पताल में आग से बचाव के बंदोबस्त पुख्ता होने चाहिए। इसके लिए हर साल ऑडिट की व्यवस्था की जानी चाहिए। क्योंकि दो साल के अंदर कोई फायर सिस्टम काम नहीं कर रहा या अनदेखी का शिकार हुआ तो साल भर की ऑडिट में कमी सामने आ जाए। नहीं तो आपात स्थिति में उपकरण काम नही करने की स्थिति में बड़ी घटना का अंदेशा बना रहता है।



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