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कोई अपने हिस्से की दो गज जमीन नहीं छोड़ता, तो मकान-जमीन छोड़ना तो सोचा भी नहीं जा सकता। इसके विपरीत, मुकंदरा टाइगर रिजर्व में 327 परिवारों ने वन्यजीवों के लिए समर्पण किया है। इनके पुरखे सदियों से यहीं आबाद थे। यदि ये जंगल में ही रहते तो वन्यजीवों से

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जंगल की जमीन छोड़ने पर रीलोकेट किए स्थान पर इन्हें सरकार ने बुनियादी सुविधाएं दी हैं। इससे बाघों का कुनबा बढ़ाने के प्रयासों को मदद मिली। इस समर्पण के लिए जिला प्रशासन ने इन्हें सम्मानित भी किया। टाइगर रिजर्व का नोटिफिकेशन 2013 में जारी हुआ था। इसके बाद 3 अप्रैल 2018 को यहां बाघ रिलीज कर दिया था। क्षेत्र में बसे 14 गांवों के 1955 परिवारों का पुनर्स्थापन करना था। इनमें से 327 परिवार स्वेच्छा से मकान छोड़कर अन्यत्र बस गए। प्रत्येक परिवार को 15 लाख रुपए का पैकेज दिया गया। 50 परिवारों की और प्रक्रिया चल रही है।

1500 के करीब परिवार अभी वहीं हैं, जिनसे समझाइश की जा रही है। टाइगर रिजर्व में आए गांवों में न बिजली पहुंच सकती है न सड़क बनना संभव है। स्कूल, अस्पताल और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। अधिकारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के समझाने पर ये तैयार हुए। लक्ष्मीपुरा गांव पूरा विस्थापित हो चुका है। खरली बावड़ी और घाटी जागीर से भी सभी परिवार, मशालपुरा के 90% परिवार जा चुके हैं। दामोदरपुरा में विस्थापन प्रक्रिया हो चुकी है।

“इन परिवारों की पहल सराहनीय है। यहां उनके लिए बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार के स्तर पर भी मुश्किल था। जहां से गांव रीलोकेट हुए हैं, वहां ग्रासलैंड विकसित हो गए हैं। वन्यजीवों की तादाद बढ़ी है।”



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