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राजस्थान हाईकोर्ट ने भीलवाड़ा की ग्राम पंचायत भगवानपुरा सरंपच की याचिका पर भीलवाड़ा उपखंड अधिकारी और पुलिस अधीक्षक को पंचायत भूमि से अतिक्रमण हटाने के लिए पुलिस सहायता प्रदान करने का निर्देश दिया है। जस्टिस कुलदीप माथुर ने मौजूदा रिट याचिका के साथ-साथ
याचिकाकर्ता ग्राम पंचायत भगवानपुरा की सरपंच रतना प्रभा चुंडावत के वकील ने कोर्ट में बताया कि जिला कलेक्टर भीलवाड़ा द्वारा 25 दुकानों के पट्टे जारी करने की प्रक्रिया को पहले ही अवैध घोषित किया जा चुका है। ये पट्टे पंचायती राज अधिनियम 1994 के प्रावधानों के विरुद्ध जारी किए गए थे। कलेक्टर के निर्णय के बाद पट्टाधारियों को अतिक्रमणकारी घोषित कर दिया गया।
पुलिस सहायता मांगी, लेकिन मिली नहीं
ग्राम पंचायत ने अतिक्रमणकारियों को हटाने के लिए उपखंड अधिकारी भीलवाड़ा और पुलिस अधीक्षक भीलवाड़ा को पत्र लिखकर पुलिस सहायता की मांग की थी। पंचायत द्वारा कई बार अनुरोध के बावजूद संबंधित अधिकारियों द्वारा पुलिस सहायता प्रदान करने की कोई कार्रवाई नहीं की गई।
याचिकाकर्ता की ओर से राजस्थान पंचायती राज नियम 1996 की धारा 165(6) का हवाला दिया। इस नियम के अनुसार जब ग्राम पंचायत पाती है कि उसकी भूमि पर अतिक्रमण हुआ है, तो वह सीधे या संबंधित क्षेत्र के उपखंड मजिस्ट्रेट के माध्यम से अतिक्रमण हटाने के लिए पुलिस सहायता ले सकती है।
कई बार आग्रह के बावजूद सहयोग नहीं मिला, तो इस मामले में कुल पांच सरकारी अधिकारियों को प्रतिवादी बनाया गया। इनमें राज्य सरकार स्थानीय स्व-शासन विभाग के प्रधान सचिव के माध्यम से, उपखंड अधिकारी भीलवाड़ा, विकास अधिकारी पंचायत समिति मंडल जिला भीलवाड़ा, जिला कलेक्टर भीलवाड़ा और पुलिस अधीक्षक भीलवाड़ा शामिल थे।
अब चार सप्ताह में कार्रवाई का आदेश
जस्टिस कुलदीप माथुर ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों का अवलोकन करने के बाद कहा कि राजस्थान पंचायती राज नियम 1996 की धारा 165(6) के अनुसार कार्रवाई करना उचित और न्यायसंगत है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि उपखंड अधिकारी भीलवाड़ा और पुलिस अधीक्षक भीलवाड़ा को ग्राम पंचायत भगवानपुरा को उचित पुलिस सहायता प्रदान करनी होगी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह सहायता नियम के अनुरूप उन दुकानदारों द्वारा किए गए कथित अतिक्रमण को हटाने के लिए दी जानी है, जिनके पट्टे जिला कलेक्टर द्वारा अवैध और पंचायती राज अधिनियम के प्रावधानों के विरुद्ध घोषित किए जा चुके हैं। कोर्ट ने यह कार्रवाई यथाशीघ्र, अधिमानतः आदेश की तारीख से चार सप्ताह के भीतर करने का आदेश दिया है।
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