जैसलमेर। ग्रामीणों को ऊंट सौंपते BSF के अधिकारी।
पश्चिमी राजस्थान से लगाती भारत-पाकिस्तान सीमा पर देश की पहली रक्षा पंक्ति सीमा सुरक्षा बल सरहद की रक्षा करती है। मगर इस रेगिस्तान में जवानों का सबसे बड़ा साथी ऊंट है जो देश की रक्षा में कंधे से कन्धा मिलाकर BSF के साथ खड़ा रहता है। रेगिस्तान में जहां इ
वहां ये सिपाही (ऊंट) बड़े आराम से जवानों को ले जाता है। इन्ही के साथ की वजह से रेगिस्तान में भारत की सरहद मजबूत और अभेद है। लेकिन सरहद के ये साथी जब रिटायर होते हैं तब इनकी कौन सुध लेता होगा ये सबसे बड़ा सवाल सबके जेहन में आता होगा। दरअसल, सीमा सुरक्षा बल इन ऊंटों के रिटायरमेंट के बाद इनको सरहदी गांव के ग्रामीणों को सौंप देते हैं। जिससे ऊंट रिटायरमेंट के बाद भी आम लोगों की सेवा करता है।

10 साल की सेवा के बाद ऊंटों को किया रिटायर।
59 ऊंटों को सौंपा ग्रामीणों को
बीएसएफ, सेक्टर मुख्यालय जैसलमेर-उत्तर के उप महानिरीक्षक (DIG) योगेन्द्र सिंह राठौड़ के निर्देशन में एक प्रेरणादायी और मानवीय पहल के तहत एक विशेष कार्यक्रम में 59 ऊंटों को ग्रामीणों को सौंपा गया। इस कार्यक्रम में सेक्टर मुख्यालय जैसलमेर-उत्तर के तहत आने वाली बीएसएफ की विभिन्न बटालियनों द्वारा रेगिस्तान के गौरव ऊंटों को उनके 10 वर्षों की समर्पित सेवा के बाद ऐसे सीमावर्ती पशुपालकों और पशुप्रेमियों को सौंपा गया, जो इन्हें जीवनभर देखभाल और संरक्षण प्रदान करेंगे।
BSF DIG योगेंद्र सिंह राठौड़ ने इस मौके पर कहा- ये पहल बीएसएफ के उस सेन्स ऑफ रिस्पांसबिलिटी का प्रतीक है, जिसमें न केवल सीमाओं की सुरक्षा बल्कि सीमावर्ती नागरिकों की भलाई भी सर्वोच्च प्राथमिकता में है। हमने ग्रामीणों से अपील की है कि वे इन ऊंटों की देखरेख ससम्मान करें और उन्हें नया परिवार प्रदान करें।
ग्रामीणों ने BSF का जताया आभार
इस आयोजन से ग्रामीणों में उत्साह देखने को मिला। उन्होंने बीएसएफ इस प्रयास की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हुए इस मानवीय पहल की सराहना की। पशुपालकों ने भरोसा दिलाया कि वे इन ऊंटों की देखभाल पूरी जिम्मेदारी और स्नेह-पूर्वक से करेंगे। जिसमें उचित आहार, समय-समय पर मेडिकल चेकअप, ट्रीटमेंट और सम्मानजनक व्यवहार शामिल रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि वे समय- समय इन ऊंटों की स्थिति की जानकारी बीएसएफ को देंगे।

अब ग्रामीण करेंगे ऊंटों की सेवा।
सरहद के ग्रामीणों के साथ खड़ी है BSF
ग्रामीणों ने इस सराहनीय पहल को निरंतर जारी रखने की मांग करते हुए कहा कि इस प्रकार की मानवीय पहल न केवल बीएसएफ और नागरिकों के बीच विश्वास को मजबूत करती है, बल्कि समाज में सह-अस्तित्व और सहयोग की भावना को भी प्रोत्साहित करती है। इस मौके पर बीएसएफ अधिकारियों ने सभी ग्रामीणों को धन्यवाद दिया और आश्वस्त किया कि बीएसएफ न केवल राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा के लिए, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास और सहयोग के लिए सदैव तैयार रहेगी।
बीएसएफ ऊंट सेना
बताया जाता है कि जब ऊंट भारतीय सेना की ग्रेनेडियर इकाइयों का हिस्सा थे, तब उन्होंने 1948 और 1965 के युद्धों में भाग लिया था। सीमा सुरक्षा बल की स्थापना 1965 में हुई थी और उसके तुरंत बाद, भारतीय सैन्य ऊंटों को प्रशिक्षण और सुरक्षा कार्यों के लिए उनके पास भेजा गया। 1971 के युद्ध में बीएसएफ के ऊंटों ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। 1976 में पहली बार नई दिल्ली के राजपथ पर गणतंत्र दिवस परेड में BSF की ऊंट टुकड़ी ने प्रदर्शन किया।

सरहद पर जवानों के साथ मुस्तैदी के साथ ड्यूटी करते रेगिस्तान के जहाज।
ऊंट प्रशिक्षण और प्रदर्शन
सीमा सुरक्षा बल के पास लगभग 1200 नर ऊंट हैं। ऊंटों को 5 साल की उम्र में खरीदा जाता है और औपचारिक पशु चिकित्सा निरीक्षण के बाद उन्हें भर्ती किया जाता है। औसतन, एक ऊंट बल में 10 साल तक सेवा करता है और 15 या 20 साल की उम्र में सक्रिय सेवा से सेवानिवृत्त हो जाता है। बीएसएफ में मुख्य रूप से तीन प्रकार के ऊंट हैं – जैसलमेरी, जो मजबूत शरीर वाले होते हैं, बीकानेरी-जो तेज गति से दौड़ने वाले होते हैं, और नाचना- जिनका उपयोग औपचारिक कार्यों के लिए किया जाता है।
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