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झालावाड़ मेडिकल कॉलेज में लेप्रोस्कोपिक तकनीक से बिना चीरफाड़ के 7 माह में 300 से ज्यादा सफल ऑपरेशन हुए।
झालावाड़ मेडिकल कॉलेज ने चिकित्सा के क्षेत्र में एक नया मुकाम हासिल किया है। कॉलेज में सीमित संसाधनों के बावजूद लेप्रोस्कोपिक तकनीक से उच्च स्तरीय ऑपरेशन किए जा रहे हैं। यह तकनीक बिना चीरफाड़ के मरीजों का इलाज करने में सक्षम है।
यूरोलॉजी विभाग ने पिछले 10 दिनों में तीन जटिल लेप्रोस्कोपिक ऑपरेशन सफलतापूर्वक किए हैं। इनमें दो लेप्रोस्कोपिक एंडरसन हाइन्स मेम्बड पाइलोप्लास्टी और एक लैप्रोस्कोपिक नेफ्रेक्टॉमी शामिल हैं।
एक उल्लेखनीय केस में, खेड़ी जीरापुर (मध्य प्रदेश) की 47 वर्षीय महिला का सफल इलाज किया गया। उनकी बाईं किडनी में जन्मजात रुकावट थी। विभाग ने पहले परम्यूटेशन नेफ्रेक्टॉमी ट्यूब लगाई। इससे किडनी ने काम करना शुरू कर दिया। फिर ए.एच.डी पाइलोप्लास्टी पद्धति से किडनी की रुकावट दूर की गई।
झालरापाटन के 70 वर्षीय रजाक मोहम्मद का भी इलाज किया गया, जो किडनी में पथरी और ब्लॉकेज से पीड़ित थे। यह तकनीक पहले केवल बड़े शहरों के अस्पतालों में ही उपलब्ध थी। पुरानी तकनीक में मरीजों को स्वस्थ होने में महीनों का समय लगता था, लेकिन अब रिकवरी समय काफी कम हो गया है।
टीम ने किया सहयोग
ऑपरेशन के दौरान डॉ.विशाल नेनीवाला के अलावा डॉ. चमन नागर,डॉ. आशीष, एनेस्थीसिया से डॉ.राजननन्दा, डॉ. सुधीर शर्मा, डॉ. रक्षा, डॉ सतीश ,डॉ मोहन ,मेडिकल स्टॉफ कीर्ति मित्तल, कन्हैया लोहार , दिलीप कलाल ,मुकेश सामरिया, रोहित कश्यप , तूफान सिंह ने सहयोग किया।
7 माह में कर दिए 300 ऑपरेशन
यूरोलॉजी विभाग की ओर से झालावाड़ जिला अस्पताल में मेडिकल कॉलेज में आने वाले मरीज का 7 माह में करीब 300 से अधिक सभी प्रकार के ऑपरेशन दूरबीन के माध्यम से निशुल्क किए गए हैं।
लेप्रोस्कोपिक तकनीक से कई फायदे
लेप्रोस्कोपिक ऑपरेशन के फायदे अधिक है, इसमें चीरा कम लगता है, इससे मरीज की रिकवरी जल्दी होती है। मरीज जल्दी काम पर लौट सकता है। मरीज को दर्द कम होता है। अस्पताल में भी कम रुकना पड़ता है। और बार-बार आंतों में रुकावट नहीं होती है। वहीं, ब्लड-लॉस कम होता है तथा कॉस्मेटिक भी परिणाम अच्छे है।
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