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राजस्थान के झालावाड़ जिले के पिपलोदी गांव में सरकारी स्कूल की छत गिरने से 7 बच्चों की मौत हो गई। अब इस हादसे की जांच से पहले बिल्डिंग पर ध्वस्त करने को लेकर सबूत मिटाने के आरोप लग रहे हैं। पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रमोद जैन भाया ने भी सवाल उठाते हुए कहा

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भास्कर ने इन्वेस्टिगेशन कर जाना कि आखिर हादसे के तत्काल बाद आनन-फानन में क्यों इस स्कूल की बिल्डिंग को बुलडोजर से तोड़ दिया गया? इस कार्रवाई के चलते हादसे की जांच पर क्या असर पड़ेगा? डिमोलिशन के आदेश किसने दिए? क्या वास्तव में हादसे के जिम्मेदारों को बचाने का प्रयास किया गया है? पढ़िए संडे बिग स्टोरी में….

7.30 बजे हादसा, महज 5 घंटे में सर्वे के बाद जेसीबी चलाई

स्कूल की बिल्डिंग हटाने को लेकर इसलिए भी सवाल उठ रहे हैं कि हादसे की महज कुछ ही घंटों में अधिकारियों को बुलाकर सर्वे हो गया। थोड़ी ही देर बाद बुलडोजर बुलवाकर पूरी बिल्डिंग ध्वस्त कर दी गई। शुक्रवार सुबह करीब 7.30 बजे हादसा हुआ था। इसके बाद मौके पर गई भास्कर टीम ने नोटिस किया कि 1 बजे से पहले-पहले पूरी बिल्डिंग को गिरा दिया गया।

हमने पिपलोदी गांव में मौजूद अकलेरा एसडीएम बाबूलाल मीणा से बात की। उनसे सवाल पूछा कि आखिर क्यों हादसे के बाद इस स्कूल बिल्डिंग को बुलडोजर चला कर डिमॉलिश कर दिया गया? इस पर एसडीएम मीणा ने बताया कि स्कूल बिल्डिंग क्षतिग्रस्त थी और गांव वालों की भी मांग थी कि स्कूल अब हम यहां नहीं चलाएंगे। इसके बाद हमने पीडब्ल्यूडी से सर्वे करवा लिया था।

क्या आपने पीडब्ल्यूडी का सर्वे हादसे के कुछ देर बाद ही करवा लिया? इस पर उन्होंने बताया- कुछ देर बाद नहीं बल्कि काफी देर बाद ये हुआ था और इससे अब इन्वेस्टिगेशन पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। हमने सारे बच्चे वहां से पहले ही रेस्क्यू कर लिए थे। अब यहां कोई नया हादसा नहीं हो और आधी दीवार तो पहले ही गिर गई थी। क्या पता बाकी आधी दीवार गिरने से कोई जानवर या बच्चा मार जाता तो, इस लिहाज से ही इसे डिमॉलिश किया गया था।

बिल्डिंग को डिमॉलिश करने का आदेश किसने दिया था? सवाल के जवाब में एसडीएम मीणा ने बताया कि झालावाड़ जिला कलेक्टर अजय सिंह राठौड़ सहित सभी बड़े अधिकारी मौके पर मौजूद थे। सभी की मौजूदगी में मौखिक निर्णय से इसे डिमॉलिश करना तय किया गया था। ये एहतियातन डिसीजन था।

कलेक्टर बोले- पूरी स्कूल बिल्डिंग नहीं गिराई

जिला कलेक्टर अजय सिंह राठौड़ ने टेलिफोनिक बातचीत में बताया कि पूरी स्कूल बिल्डिंग को ध्वस्त नहीं किया गया है बल्कि इस हादसे के बाद जो दीवारें क्षतिग्रस्त हो गई थी, केवल उन्हें ही हटाया गया है। मौके पर पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर्स मौजूद थे, उन्हें निर्देशित कर उनकी देखरेख में ही यह सब किया गया था। कोई नया हादसा न हो और किसी कोई कोई नुकसान नहीं हो इसे देखते हुए ऐसा निर्णय लिया गया।

हादसे की 2 बड़ी वजहें, जिनकी स्वतंत्र पड़ताल घटनास्थल की यथास्थिति पर ही संभव

पहली वजह : 31 साल पुरानी बिल्डिंग, मरम्मत के नाम पर खानापूर्ति

स्कूल की इस बिल्डिंग का निर्माण मनपसर ग्राम पंचायत ने वर्ष 1994 में करवाया था। तब पट्टियों से छत डाली गई थी। ग्रामीणों से बातचीत में सामने आया कि जर्जर भवन की छत के लिए तीन साल पहले 1 लाख 20 हजार रुपए जारी हुए थे। लेकिन छत पर सीमेंट प्लास्टर कर छोड़ दिया गया। कमरों में अंदर की तरफ जर्जर छतों की कोई मरम्मत नहीं करवाई गई। दो कमरों में तो हालत बहुत खराब थी जिसमें से एक की छत ढह ही गई।

स्कूल का वो क्लासरूम जहां छत गिरी और उसमें दबकर 7 बच्चों की मौत हो गई।

स्कूल का वो क्लासरूम जहां छत गिरी और उसमें दबकर 7 बच्चों की मौत हो गई।

दूसरी वजह : कमजोर छत पर बार-बार प्लास्टर से बढ़ा वजन

हादसे में जान गंवाने वाली 7 साल की बच्ची पायल की मां गुड्डी बाई ने बताया कि इस हादसे में सबसे बड़ी गलती स्थानीय मनपसर ग्राम पंचायत की है। स्कूल के बनने के बाद इसमें पढ़ने वाले कई लोग बड़े होकर मर गए, लेकिन बिल्डिंग को कभी भी दोबारा नहीं बनवाया गया। बिल्डिंग की छत पहले से ही कमजोर थी। मरम्मत के नाम पर बार-बार पट्टियों पर मसाला चढ़ाया गया था। इसी से चट्टान की पट्टियों से बनी छत पर वजन बढ़ता गया और ये पानी के जमा होने से भरभरा कर गिर गई।

गांव में और भी कई लोगों ने यही दावा किया कि शायद स्कूल की छत पर मरम्मत के नाम पर चढ़ाए गए मसाले से वजन बढ़ गया था, संभवतः: हादसे की यही वजह रही होगी। हालांकि क्षतिग्रस्त हिस्से को अब पूरी तरह से डिमॉलिश कर दिए जाने से इस दावे की सही तरीके से पड़ताल कर पाना मुमकिन नहीं है।

विभाग ने 10 घंटे में तथ्यात्मक रिपोर्ट भी जारी की

कोटा के संभागीय आयुक्त राजेंद्र सिंह शेखावत ने बताया था कि घटना को लेकर जिला कलेक्टर ने जांच टीम का गठन कर दिया है। वो टीम ये जांच करेगी कि क्या इश्यू रहे हैं और किस प्रकार से ये घटना हुई है। यहां हैरान करने वाली बात ये है कि हादसे के महज 10-12 घंटों में विभाग के अधिकारियों ने तथ्यात्मक रिपोर्ट भी दे दी।

इस रिपोर्ट में हादसे के पीछे कारण भी पानी के भराव को बताया गया है। मनोहरथाना ब्लॉक के मुख्य ब्लॉक शिक्षा अधिकारी ने इस हादसे को लेकर मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी को जो तथ्यात्मक रिपोर्ट भेजी है उसमे लिखा गया है कि इस स्कूल की पिछली दीवार की नींव में पानी का अत्यधिक भराव होने की वजह से ये भर भरभराकर गिर गई और इसी वजह से छत गिरी।

इसी तथ्यात्मक रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि स्कूल बिल्डिंग का निर्माण साल 1994 में मनपसर ग्राम पंचायत द्वारा करवाया गया था। इसे शिक्षा विभाग ने नहीं बनवाया था। वहीं इसी स्कूल में शिक्षा विभाग ने सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत यहां कक्ष का निर्माण करावाया था, जो अभी भी पूरी तरह से सही हालत में स्कूल परिसर में मौजूद है।

कितना जरूरी थे वो कमरे जिन्हें ध्वस्त कर दिया गया?

ऐस मामलों के एक्सपर्ट और रिटायर्ड इंजीनियर (स्वायत्त शासन विभाग) महेंद्र सिंह ने बताया कि हादसे के कारणों का पता लगाने के लिए उन कमरों के निर्माण की क्वालिटी क्या थी? उनके क्या मटेरियल यूज हुआ था? रिपेयरिंग में क्या किया गया था? इन सब का पता लगाया जाना आवश्यक था। अब वहां पर जांच से पहले ही इन कमरों को पूरी तरह से बुलडोजर चलाते हुए समतल मैदान बना दिया गया है। ऐसे में क्या जांच होगी? जब जांच का आधार ही खत्म कर दिया गया है। दोषी अधिकारियों पर इस कृत्य के लिए कार्रवाई होनी चाहिए।

इस तरह की घटनाओं पर क्या कहते हैं नियम?

पीडब्ल्यूडी के रिटायर्ड XEN हनुमान कड़वासरा ने बताया कि किसी भी सरकारी बिल्डिंग के पुराने होने या जर्जर होने मात्र से ही उसे ध्वस्त नहीं किया जा सकता है। नियमानुसार ऐसा करने से पहले उस बिल्डिंग की मालिक संस्था को जिला कलेक्टर के माध्यम से पीडब्ल्यूडी के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर से बिल्डिंग का सेफ्टी सर्टिफिकेट लेना होता है। पीडब्ल्यूडी द्वारा करवाई जाने वाली जांच ही ये तय कर सकती है कि कोई भी बिल्डिंग सेफ है या नहीं।

एग्जीक्यूटिव इंजीनियर द्वारा दिए गए ऑर्डर के बाद ही उस बिल्डिंग को ध्वस्त किये जाने या जिंदा हालत में रखने का निर्णय किया जा सकता है। वहीं अगर किसी जीर्ण-शीर्ण बिल्डिंग में किसी हादसे को लेकर कोई जांच पेंडिंग है तो ऐसी अवस्था में उस बिल्डिंग से जान-माल के खतरे को देखते हुए पूरे एरिया को कोर्डोन ऑफ़ (सीज करने की प्रक्रिया) किया जा सकता है। एरिया कोर्डोन ऑफ पीडब्ल्यूडी करता है तो वहीं जिला कलेक्टर और एसपी उस एरिया की सुरक्षा का प्रबंध करते हैं। जांच रिपोर्ट आने के बाद एग्जीक्यूटिव इंजीनियर की सेफ्टी रिपोर्ट के आधार पर ही ध्वस्त करने का निर्णय किया जाता है।

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दिखाने की कोई चीज है तो वह है दया…क्लास रूम की दीवार पर लिखी ये लाइन झालावाड़ जिले के पिपलोदी गांव के बच्चे रोज पढ़ते थे। उन्हें क्या पता था सरकारी सिस्टम के पास दया नहीं होती। हां, दिखाने के लिए घड़ियाली आंसू जरूर होते हैं, जो हर हादसे के बाद जमकर बहाए जाते हैं। इसी स्कूल के 7 बच्चों की मौत हुई है और 27 घायल हुए हैं। कई बच्चे अब तक बेसुध हैं…(CLICK कर पढ़ें)



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