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इंदिरा गांधी प्रियदर्शनी ऑडिटोरियम में रविवार को इतिहास और गौरव की एक अनोखा दिन देखने को मिला। प्रसिद्ध इतिहासविद् राजवीर सिंह चकलोई ने ‘चित्तौड़ गाथा’ कार्यक्रम के दौरान मेवाड़ के वीरता भरे इतिहास का वर्णन किया। उन्होंने खासतौर पर महाराणा सांगा की व

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महाराणा सांगा पर विवादित बयान पर दी प्रतिक्रिया

राजवीर सिंह चकलोई ने हाल ही में समाजवादी पार्टी के सांसद रामजी लाल सुमन द्वारा संसद में दिए गए बयान की तीखी आलोचना की। सांसद ने कहा था कि महाराणा सांगा ने बाबर को भारत बुलाया था, जिस पर इतिहासकार ने नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि यह बयान बिना ऐतिहासिक जानकारी के दिया गया है और इस तरह के गंभीर और तथ्यहीन बयान संसद जैसे मंच पर नहीं दिए जाने चाहिए।

ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ था।

ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ था।

इतिहास एक पक्ष का नहीं होता, पर तथ्य भी जरूरी हैं

राजवीर सिंह चकलोई ने कहा कि हम मानते हैं कि इतिहास को हर पक्ष से देखना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि बिना पढ़े और बिना तथ्यों के कुछ भी कह दिया जाए। उन्होंने कहा कि महाराणा सांगा ने जिन जगहों पर युद्ध लड़े, वे सभी चित्तौड़ से सैकड़ों किलोमीटर दूर थीं। इससे साफ होता है कि वह सिर्फ अपनी रियासत की नहीं, बल्कि पूरे भारत की रक्षा के लिए लड़े।

500 किलोमीटर दूर जाकर युद्ध करने वाला राजा कभी झुक नहीं सकता

राजवीर सिंह ने विस्तार से बताया कि महाराणा सांगा ने कितनी दूर जाकर युद्ध लड़े थे:

  • कोटा के खतौली में, जो चित्तौड़ से 285 किलोमीटर दूर है
  • धौलपुर के बड़ी में, 470 किलोमीटर दूर
  • गुजरात के इडर में, 290 किलोमीटर दूर
  • मालवा के गागरोन में, 250 किलोमीटर दूर
  • भरतपुर के बयाना में, 490 किलोमीटर दूर

इतना दूर जाकर लड़ाई लड़ने वाला योद्धा बाबर को युद्ध में साथ पाने के लिए भारत बुलाएगा, यह बात तर्क और समझ दोनों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि जिस राजा ने 500 किलोमीटर दूर जाकर किसी अन्य राजा की बैंड बजा दी है, वह बाबर को इब्राहिम लोदी को हराने के लिए बुलाएगा, यह बात हजम नहीं होती। इब्राहिम लोदी की अपने क्षेत्र से 80 किलोमीटर तक नहीं चल रही है। इधर, चित्तौड़गढ़ के राजा ने 470 किलोमीटर जाकर इब्राहिम लोदी को हराकर आया और यह बात बोला जा रहा है कि इब्राहिम लोदी से तंग आकर राणा सांगा ने बाबर को भारत बुलाया है। कहां की बात कहां जोड़ दी। अगर बाबर को राणा सांगा ने बुलाया है तो बयाना का युद्ध क्यों लड़ा गया। सांगा और बाबर दोस्त थे तो आपस में क्यों भिड़े, इसका जवाब नहीं है किसी के पास।

युवाओं के अलावा बच्चों में भी दिखा राजवीर सिंह के साथ सेल्फी लेने का क्रेज।

युवाओं के अलावा बच्चों में भी दिखा राजवीर सिंह के साथ सेल्फी लेने का क्रेज।

बाबर ने क्यों नहीं किया राजस्थान पर कब्जा

राजवीर सिंह ने बाबर के विषय में भी बात की। उन्होंने कहा कि अगर बाबर इतना शक्तिशाली था और भारत पर विजय प्राप्त करना चाहता था, तो उसने राजस्थान पर कब्जा क्यों नहीं किया? बाबर ने खुद लिखा कि राजस्थान में गर्मी बहुत होती है, इसलिए वह नहीं आया। इस पर चकलोई ने तीखा कटाक्ष करते हुए कहा कि राजस्थान में गर्मी नहीं, बल्कि यहां के लोग ज्यादा गर्म थे।

इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश करने की साजिश की

राजवीर सिंह ने कहा कि हमें इतिहास का वो पक्ष ही पढ़ाया गया जिसमें केवल हार और पराजय थी। लेकिन हमारी विजयों, बलिदानों और संघर्षों को नजरअंदाज किया गया। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि ऐसे विकृत इतिहास को चुनौती दी जाए और नई पीढ़ी को सच्चा इतिहास बताया जाए।

चित्तौड़ सिर्फ एक शहर नहीं, विचारधारा है

इतिहासकार ने कहा कि चित्तौड़ एक विचार है, जो हमें सिखाता है कि गिरकर भी कैसे खड़ा होना है और लड़ते रहना है। उन्होंने कहा कि चित्तौड़ मध्यकाल से पहले भी था और उसके बाद भी मजबूती से खड़ा रहा। इसकी विशेषता यही है कि यह कभी हार मानना नहीं जानता।

लोकतंत्र की शिक्षा मेवाड़ से शुरू

राजवीर सिंह चकलोई ने मेवाड़ की लोकतांत्रिक परंपरा को भी याद किया। उन्होंने बताया कि महाराणा प्रताप को गद्दी पर बैठाने का फैसला जनता ने लिया था, यह सिर्फ राजवंशीय परंपरा का हिस्सा नहीं था। इस तरह मेवाड़ ने भारत को लोकतंत्र की पहली शिक्षा दी।

कार्यक्रम में उमड़ी भीड़, युवाओं का दिखा जोश

‘चित्तौड़ गाथा’ कार्यक्रम के दौरान इंदिरा गांधी ऑडिटोरियम खचाखच भरा हुआ था। भीड़ इतनी थी कि लोग बाहर तक खड़े होकर कार्यक्रम सुनते रहे। खास बात यह रही कि बड़ी संख्या में युवाओं ने कार्यक्रम में भाग लिया, जिससे यह साफ हो गया कि आज की पीढ़ी भी अपने इतिहास और संस्कृति के प्रति जागरूक और उत्साही है।

इतिहास से सीखने की जरूरत है

राजवीर सिंह ने अंत में कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने गौरवशाली इतिहास को जानें, समझें और गर्व करें। इतिहास सिर्फ पढ़ने की चीज नहीं है, बल्कि उससे हमें कर्तव्य, साहस और आत्मसम्मान की सीख लेनी चाहिए। मेवाड़ ने हमेशा देश को यह सिखाया है कि कर्तव्य के लिए कैसे लड़ा जाता है।



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