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मदन मोहन मालवीय राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय में गुरुवार को संपन्न हुए राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान सेमिनार ने देशभर के शोधार्थियों और शिक्षकों को एक साझा मंच दिया। प्राचार्य प्रो. अशोक कुमार शर्मा की अध्यक्षता में हुए समापन सत्र में उन्होंने सभी प्रतिभागिय

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पूर्व निदेशक प्रो. रामभरोसे मिश्रा ने कहा कि “यत् पिण्डे, तत् ब्रह्मांड” यानी जो ब्रह्मांड में है वही शरीर में भी है। उन्होंने आयुर्वेद को ऋषि प्रणीत और सर्वोत्तम चिकित्सा पद्धति बताया।

मुख्य अतिथि प्रो शिवसिंह सारंगदेवोत (कुलपति, जनार्दन राय नागर विश्वविद्यालय) ने कहा कि शिक्षा को विद्यार्थी-आधारित होना चाहिए और यह सेमिनार आयुर्वेद को वैज्ञानिक नजरिए से समझने का मंच बना। विशिष्ट अतिथि प्रो. महेश दीक्षित (कुलपति, कल्लाजी वैदिक विश्वविद्यालय) ने कहा कि आयुर्विज्ञान का समापन नहीं बल्कि “समावर्तन” है और चरक संहिता के प्रत्येक कथन की सत्यता रिसर्च से साबित हो चुकी है। प्रो. गौरीशंकर इन्दौरिया और प्रो. राज्यवर्धन सिंह राय ने सुझाव दिया कि आयुर्वेद की शिक्षा बच्चों से ही शुरू होनी चाहिए। अन्य विशिष्ट अतिथियों में प्रो ओपी दाधीच, प्रो जेपी शर्मा और प्रो नरहरि पण्ड्या शामिल रहे।

आयोजन सचिव प्रो. जितेन्द्र कुमार शर्मा ने बताया कि इस संवाद में 14 विभागों के शिक्षक व शोधार्थी शामिल हुए और प्रस्तुतियां चार अलग-अलग सत्रों में हुईं। मीडिया प्रबंधन समिति संयोजक प्रो. रामकुमार भामू ने बताया कि देशभर से आए 200 शिक्षक और 470 शोधार्थियों ने भाग लिया। सदस्य डॉ. महेश गुप्ता ने बताया कि 130 आमंत्रित अतिथियों में से 80 उपस्थित हुए। डॉ. इकबाल खान गौरी ने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य “आयु की जिज्ञासा को आयुर्वेद के माध्यम से समझना” रहा। सांस्कृतिक कार्यक्रम में राजस्थान की परंपरागत नाट्य व संगीत प्रस्तुतियां हुईं। बाहर से आए अतिथियों ने भी अपनी प्रस्तुतियों से शाम को यादगार बना दिया। प्रो. अवधेश कुमार भट्ट ने आभार व्यक्त किया।



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