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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सौ वर्षों की यात्रा पर राजयवर्धन राठौड़ ने कहा कि संघ का मार्ग एकात्मता और ध्येय मानवता है। उन्होंने इस शताब्दी पड़ाव को नए युग का आह्वान बताया, जिसका मूल सूत्र ‘व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण’ है।

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राठौड़ ने कहा कि समाज ही व्यक्ति को दिशा देता है और व्यक्ति के संस्कार ही समाज का स्वरूप तय करते हैं। जब व्यक्ति संयम, अनुशासन और सेवा की भावना से सशक्त होता है, तो समाज संगठित होता है और राष्ट्र सामर्थ्यवान बनता है। संघ ने सौ वर्षों में इसी दर्शन को जीवंत किया है।

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में ‘व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण’ के लक्ष्य के साथ संघ की स्थापना की थी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में ‘व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण’ के लक्ष्य के साथ संघ की स्थापना की थी। संघ की शाखाएं इस सूत्र की प्रयोगशाला बनीं, जहां स्वयंसेवकों ने अनुशासन, संगठन, सेवा और संस्कार का जीवन सीखा।

संघ की इस यात्रा का एक गौरवपूर्ण अध्याय 1963 में लिखा गया, जब स्वयंसेवकों ने गणतंत्र दिवस परेड में भाग लिया। संघ ने निस्वार्थ भाव से राष्ट्र की सेवा करते हुए हर चुनौती पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।

सेवा की यह परंपरा केवल आपदा राहत तक सीमित नहीं

उन्होंने कहा- सेवा की यह परंपरा केवल आपदा राहत तक सीमित नहीं रही है। भूकंप, बाढ़, महामारी या किसी अन्य संकट के दौरान संघ के स्वयंसेवक हमेशा समाज के बीच पहुंचे हैं। इसके अतिरिक्त, विद्यालयों, ग्रामोन्नति योजनाओं और स्वास्थ्य शिविरों के माध्यम से संघ ने आत्मनिर्भर और सशक्त समाज गढ़ने का कार्य किया है। यह सेवा माँंभारती के प्रति निष्ठा और भक्ति से प्रेरित रही है।

इस संदर्भ में, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कहा है: “शून्य से एक शतक बने, अंक की मन भावना भारती की जय विजय हो, ले हृदय में प्रेरणा कर रहे हम साधना, मातृभू आराधना”।

युवा पीढ़ी भारत के भविष्य की सबसे बड़ी शक्ति है। उनकी ऊर्जा और उत्साह को सही दिशा मिलने पर वे पूरे राष्ट्र की गति बदल सकते हैं। संघ इसी ऊर्जा को सेवाभाव, अनुशासन और संगठन से जोड़ने का कार्य करता है।

आने वाले समय में यही युवा भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र के लक्ष्य की ओर अग्रसर करने वाले सबसे बड़े वाहक बनेंगे

शाखाओं और विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से युवाओं में समाज के प्रति उत्तरदायित्व और एकात्मता की भावना विकसित होती है। जब युवा मानवता के भाव से प्रेरित होकर कार्य करते हैं, तो वे समाज और राष्ट्र दोनों को नई ऊंचाइयों तक ले जाते हैं। आने वाले समय में यही युवा भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र के लक्ष्य की ओर अग्रसर करने वाले सबसे बड़े वाहक बनेंगे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के यशस्वी नेतृत्व में हम उसी पथ पर आगे बढ़ रहा है। उनके मार्गदर्शन में संगठन ने समाज जीवन के हर क्षेत्र शिक्षा, सेवा, पर्यावरण, ग्रामीण उत्थान और सांस्कृतिक जागरण में अपनी उपस्थिति और भी व्यापक की है।

शताब्दी का यह पड़ाव नए युग का आह्वान है। सौ वर्षों में संघ ने जो तप, त्याग और संगठन खड़ा किया है, यह भारत को आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक सामर्थ्य के साथ 2047 तक विकसित भारत की ओर ले जाएगा।



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