जयपुर के रामगढ़ बांध में क्लाउड सीडिंग के जरिए कृत्रिम बारिश कराने का प्रयोग शुरू किया गया है। पहले दिन ट्रायल फेल हो गया। कंपनी 60 दिनों तक ड्रोन के जरिए कृत्रिम बारिश करवाने का प्रयोग करेगी।
सबसे बड़ा सवाल है कि क्या रामगढ़ बांध दोबारा भरेगा और किसानों को इससे फायदा होगा या नहीं? वहीं, दावा किया जा रहा है कि इससे बादल फटने और मौसम बिगड़ने का खतरा भी है।
कहा जा रहा है- ड्रोन से कृत्रिम बारिश का प्रयोग सफल रहा तो निजी कंपनी सरकार के साथ मिलकर राजस्थान के कई और इलाकों में कृत्रिम बारिश करवाने का प्रोजेक्ट हाथ में ले सकती है।
इस एक्सप्लेनर में जानेंगे क्या राजस्थान में मिटेगा सूखे का संकट…
1. रामगढ़ बांध भरेगा या नहीं..
रामगढ़ बांध पर कृत्रिम बारिश करवाने से उसमें पानी तो आएगा कि केवल इसी से बांध नहीं भरेगा। जानकारों का तर्क है कि बांध को भरने के लिए कैचमेंट एरिया में बड़े इलाके में बारिश होना जरूरी है। बांध के कैचमेंट एरिया में बड़ी तादाद में अतिक्रमण हैं जो इसमें पानी नहीं आने दे रहे हैं। ड्रोन से कृत्रिम बारिश का प्रयोग पायलट प्रोजेक्ट है, इसका अभी सफल होना बाकी है। एक बार जब कृत्रिम बारिश हो जाएगी, तब डेटा एनालिसिस से यह अनुमान लगेगा कि कृत्रिम बारिश से कितना पानी आएगा? सब कुछ इस ट्रायल की सफलता पर ही टिका है।

जयपुर में यह प्रयोग पहली बार क्यों किया जा रहा है?
राजस्थान में बारिश की कमी रहती है। अच्छे मानसून के बावजूद कुछ इलाकों में एक बारिश की कमी की वजह से फसलें चौपट हो जाती हैं। निजी कंपनी ने राजस्थान सरकार को कृत्रिम बारिश का आइडिया दिया। सरकार ने इसकी अनुमति दे दी। कृत्रिम बारिश पर प्रयोग करने वाली कंपनी के संस्थापक जयपुर के हैं, इसलिए उन्होंने जयपुर को चुना।
पहले दिन कृत्रिम बारिश का ट्रायल क्यों फेल हुआ? अब आगे ट्रायल कब होगा?
पहले दिन रामगढ़ बांध पर ड्रोन से कृत्रिम बारिश का प्रयोग फेल रहा, ड्रोन बादलों तक पहुंच ही नहीं पाया। बारिश के बादल कम से कम 2000 फीट की हाइट पर होते हैं, बारिश के बादलों की उंचाई 2000 फीट से 20 हजार फीट तक हो सकती है। कृत्रिम बारिश का ट्रायल करने वाली कंपनी जेनेक्स एआई का दावा है कि उनके पास अभी 400 फीट तक ड्रोन उड़ाने की ही अनुमति थी। ऐसे में बादलों तक ड्रोन पहुंच ही नहीं पाया। अब 10 हजार फीट तक ड्रोन उड़ाने की डीजीसीए से अनुमति मिलना बाकी है। 7 से 10 दिन में अनुमति मिलने की संभावना है। अब अगला ट्रायल इस अनुमति के बाद ही होगा। कंपनी इस बार सार्वजनिक घोषणा किए बिना ट्रायल करेगी ताकि भीड़ नहीं जुटे।
2. आखिर कैसे होती है कृत्रिम बारिश…
कई बार बादलों में पर्याप्त नमी होने के बावजूद बारिश नहीं होती। बादलों पर खास रसायन छिड़ककर भारी किया जाता है, रसायन के संपर्क में आकर कुछ ही मिनटों में बादलों से पानी बरसने लगता है। इसके लिए अब तक प्लेन और यूएवी का इस्तेमाल होता रहा है। प्लेन या यूएवी से बादलों पर सीडिंग करवाई जाती है। सीडिंग के कुछ देर बाद ही बारिश शुरू हो जाती है।

कृत्रिम बारिश के लिए ज्यादा हाइट पर उड़ने वाले खास ड्रोन इस्तेमाल किए जाते हैं। ड्रोन को बादलों के ऊपर उड़ाकर केमिकल छिड़का जाता है। जयपुर में कृत्रिम बारिश का प्रयोग कर रही कंपनी सोडियम क्लोराइड का इस्तेमाल कर रही है। देश दुनिया में बाकी जगहों पर दूसरे केमिकल प्रयोग में लिए जाते हैं। ड्रोन से नमी वाले बादलों के ऊपर सोडियम क्लोराइड छिड़कर कर उन्हें सीड किया जाता है। सोडियम क्लोराइड के छिड़काव के बाद बादल बरसने लगते हैं।
क्लाउड सीडिंग क्या है और यह कैसे काम करता है?
नमी वाले बादलों पर सिल्वर आयोडाइज, सोडियम क्लोराइड, सॉलिड कार्बन डाईऑक्साइड में से कोई एक केमिकल का छिड़काव किया जाता है। जब ये केमिकल बादलों में मिलकर रिएक्शन करते हैं, तो उनमें मौजूद नमी बूंदों में बदलकर भारी होने लगती है और इससे बारिश होने लगती है। नमी वाले बादलों को केमिकल से सीड करके उन्हें बरसाना क्लाउड सीडिंग तकनीक के नाम से जाना जाता है। विकसित देशों में यह तरीका बहुत पहले से अपनाया जा रहा है। क्लाउड सीडिंग के लिए प्लेन, यूएवी और ड्रोन इस्तेमाल किए जाते हैं।
बारिश कराने के लिए ड्रोन में कौन-कौन से केमिकल का उपयोग किया जाता है?
सोडियम क्लोराइड, सॉलिड कार्बन डाईऑक्साइड का प्रयोग किया जाता है। सिल्वर आयोडाइड का इस्तेमाल आम तौर पर प्लेन से की जाने वाली क्लाउड सीडिंग में प्रयोग किया जाता है।
3. हेलिकॉप्टर को क्यों नहीं चुना गया, कितने ड्रोन आएंगे काम…
ड्रोन टेक्नोलॉजी इस काम के लिए क्यों चुनी गई? (हेलिकॉप्टर या प्लेन की जगह ड्रोन क्यों?) प्लेन और ड्रोन से कृत्रिम बारिश में क्या फर्क होता है?
प्लेन से क्लाउड सीडिंग में बड़े इलाके को कवर किया जाता है। प्लेन बड़े बादल को कवर करते हुए बड़ी दूरी तक क्लाउड सीडिंग करता है। प्लेन से होने वाली क्लाउड सीडिंग से काफी बड़े इलाके में कृत्रिम बारिश होती है, इसमें इलाका कंट्रोल में नहीं होता है। कितनी बारिश होगी, यह भी कंट्रोल नहीं होता, कई बार ज्यादा छिड़काव से बादल फटने का खतरा हो जाता है। ड्रोन से क्लाउड सीडिंग सस्ता होने के साथ छोटे इलाके में बारिश करवाई जा सकती है।

जयपुर में निजी कंपनी ने ड्रोन से कृत्रिम बारिश करवाने में प्रीसीजन तकनीक का प्रयोग कर सब कुछ कंट्रोल्ड परिस्थितियों में ट्रायल करने का दावा किया है। कंपनी का दावा है कि उनके पास पेटेंटेड तकनीक है जो छोटे इलाके में कृत्रिम बारिश करवाने में सक्षम है। जितनी जरूरत उतनी बारिश करवाई जा सकती है, जबकि प्लेन से क्लाउड सीडिंग पर कोई कंट्रोल नहीं होता। जयपुर में चल रहे ट्रायल में ड्रोन से कृत्रिम बारिश के लिए एक उड़ान में केवल 1500 ग्राम सोडियम क्लोराइड का प्रयोग हो रहा है।
जहां कृत्रिम बारिश करवाई जाए, क्या वहां हमेशा इसकी जरूरत पड़ेगी?
कृत्रिम बारिश तभी करवाई जाती है जब बारिश का ब्रेक हो। जब सामान्य हालत में बादल नहीं बरसते, तब कृत्रिम बारिश करवाई जाती है। जब सामान्य हालत में बारिश हो रही होती है तब कृत्रिम बारिश नहीं करवाई जाती है। रामगढ़ बांध पर यह प्रयोग किया जा रहा है। छोटे इलाके में कृत्रिम बारिश के बाद वहां सामान्य बारिश नहीं होने के प्रमाण तो नहीं हैं, क्लाउड सीडिंग वाले इलाकों में सामान्य बारिश होती रही है, लेकिन कई वैज्ञानिक पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर क्लाउड सीडिंग पर सवाल जरूर उठाते हैं। सिल्वर आयोडाइज और दूसरे केमिकल से पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को नकारा नहीं जा सकता। कृत्रिम बारिश पर कई देशों में इसके पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों पर बहस छिड़ी हुई है।
4. इससे खतरा बढ़ेगा या फायदा होगा…
क्लाउड सीडिंग के पर्यावरणीय खतरों को लेकर वैश्विक स्तर पर बहस छिड़ी है। प्लेन से होने वाली क्लाउड सीडिंग में सैकड़ों किलो केमिकल इस्तेमाल किया जाता है। बड़ी मात्रा में केमिकल का इस्तेमाल करने से उसका रिएक्शन होता है जो पर्यावरण के लिए घातक होता है। ज्यादा केमिकल के प्रयोग से बादलों का पैटर्न बिगड़ सकता है, उनसे होने वाला रिएक्शन कई बार कंट्रोल में नहीं रहता। बादल फटने, मौसम चक्र बिगड़ने जैसे खतरे पैदा हो जाते हैं। हालांकि ड्रोन से करवाई जाने वाली कृत्रिम बारिश में केमिकल की मात्रा बहुत कम होती है, इसलिए उतना नुकसान नहीं होता लेकिन वैज्ञानिकों का एक वर्ग इस तर्क से भी सहमत नहीं है।

एक बार कृत्रिम बारिश कराने में कितना खर्च आता है?
कृत्रिम बारिश का खर्च अलग अलग फैक्टर पर निर्भर करता है। प्लेन, यूएवी और ड्रोन से करवाई जाने वाली कृत्रिम बारिश का खर्च अलग अलग होता है। कितने इलाके में बारिश करवाई जा रही है इस पर निर्भर करता है। जयपुर में निजी कंपनी फिलहाल सरकार से कोई पैसा नहीं ले रही है। मोटे अनुमान के अनुसार ड्रोन से छोटे से इलाके में एक कृत्रिम बारिश पर 20 लाख से एक करोड़ तक का खर्च आ सकता है। प्लेन से इसकी लागत 10 करोड़ तक हो सकती है। आईआईटी कानपुर को दिल्ली में कृत्रिम बारिश के लिए 4 करोड़ का प्रोजेक्ट मिला है।
5. राजस्थान में सूखे के लिए वरदान साबित होगी या फेल होगा प्रोजेक्ट…
अमेरिका, रूस, चीन, वियतनाम, यूरोप के कई देश, सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, वियतनाम, साउथ अफ्रीका सहित कई देश क्लाउड सीडिंग तकनीक का प्रयोग कर कृत्रिम बारिश करवाते हैं। क्लाउड सीडिंग का मिलिट्री उद्देश्य से इस्तेमाल करने पर पाबंदी है। अमेरिका ने वियतनाम युद्ध के वक्त क्लाउड सीडिंग का इस्तेमाल कर मौसम चक्र को प्रभावित किया था।

क्या यह तकनीक स्थायी समाधान है या सिर्फ इमरजेंसी उपाय?
क्लाउड सीडिंग तकनीक स्थायी समाधान नहीं हो सकता और यह सामान्य बारिश का विकल्प नहीं बन सकती। जब मानसून में बारिश की कमी रह जाती है, उसकी कमी पूरी करने के लिए ही इमरजेंसी के तौर पर इसका प्रयोग किया जा सकता है। इस पर मौसम विभाग से लेकर सरकारी एजेंसियों की कई तरह की पाबंदियां भी रहती हैं। कई तरह के रेगुलेशन हैं।

मंगलवार को ड्रोन उड़ाने से पहले रामगढ़ बांध में वैज्ञानिकों ने विधिवत पूजा-अर्चना और हवन करके कृत्रिम बारिश के सफल होने की कामना की।

मंगलवार की शाम को कृत्रिम बारिश कराने की कोशिश में करीब 400 फीट तक ही ड्रोन को उड़ाया जा सका।
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