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पाली के निकट स्थित उतवण गांव में समुंद्र मंथन गांव में करीब 26 साल बाद समुंद्र मंथन की परम्परा निभाई गई।

पाली के उतवण गांव में 26 साल बाद समुद्र मंथन (समद डोवण) की परंपरा निभाई गई। करीब 900 महिलाएं, जिन्होंने पहले यह परंपरा नहीं निभाई हो, उन्होंने पहले गांव के तालाब की परिक्रमा लगाई। उसके बाद तालाब के पानी में खड़े होकर समुंद्र मंथन की परम्परा निभाई।

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इस दौरान भाइयों ने बहनों को पानी पिलाया और चूंदड़ी ओढ़ाकर उन्हें तालाब से बाहर लेकर आए। इस पूरे कार्यक्रम में करीब 6 हजार से ज्यादा ग्रामीणों ने हिस्सा लिया। पूरे गांव में इस दौरान गुरुवार को मेले जैसा माहौल देखने को मिला। जिसमें प्रवासी व आस-पास के गांवों से भी लोग पहुंचे।

पहले इन 3 फोटोज में ​देखिए समुद्र मंथन की परम्परा

उतवण गांव में तालाब पर करीब 6 हजार लोग समुन्द्र मंथन परम्परा के लिए जुटे।

उतवण गांव में तालाब पर करीब 6 हजार लोग समुन्द्र मंथन परम्परा के लिए जुटे।

करीब 900 महिलाएं, जिन्होंने पहले कभी यह परम्परा नहीं निभाई हो, उन्होंने इस परम्परा को निभाया।

करीब 900 महिलाएं, जिन्होंने पहले कभी यह परम्परा नहीं निभाई हो, उन्होंने इस परम्परा को निभाया।

परम्परा निभाते हुए सुख-समृद्धि की कामना को लेकर तालाब में श्रीफल नारियल फेके गए।

परम्परा निभाते हुए सुख-समृद्धि की कामना को लेकर तालाब में श्रीफल नारियल फेके गए।

पहले निकाली शोभायात्रा कार्यक्रम में सबसे पहले शोभायात्रा निकाली गई। जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं सिर पर घड़ा रख तालाब किनारे पहुंची। ग्रामीण प्रहलाद सिंह ने बताया कि इस आयोजन का धार्मिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से महत्व है। गांव में इससे पहले वर्ष 1999 में समुद्र मंथन हुआ था। लंबे अंतराल के बाद हुए आयोजन को लेकर गांव में खासा उत्साह देखने को मिला।

उतवण गांव में समुन्द्र मंथन की परम्परा के लिए ग्रामीणों ने सबसे पहले शोभायात्रा निकाली और फिर तालाब की परिक्रमा की।

उतवण गांव में समुन्द्र मंथन की परम्परा के लिए ग्रामीणों ने सबसे पहले शोभायात्रा निकाली और फिर तालाब की परिक्रमा की।

भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करने वाली परम्परा ग्रामीणों ने बताया कि समद डोवण भाई-बहन के रिश्ते को और मजबूत बनाने वाली परम्परा है। इस मौके पर तालाब किनारे मेले जैसा माहौल रहा। दूर-दराज से आए लोग भी इस परंपरा को देखने के लिए शामिल हुए। आयोजन के साथ पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा वातावरण बन गया और गांववासियों ने परंपरा को जीवंत कर अगली पीढ़ी को सौंपने का संकल्प भी लिया।

कार्यक्रम के दौरान व्यवस्था में प्रहलाद सिंह महावीरसिंह, मांगीलाल गुर्जर, गुलाबराम एडवोकेट, मंगलाराम भाट, सरपंच जोगाराम, भोपाल देवासी सहित गांव के कई मौजिज लोग जुटे रहे।

परिक्रमा के बाद बहनें तालाब के पानी में जाकर खड़ी हो गई, जिसके बाद भाई अपनी बहनों के पास पहुंचे और पानी पिलाया और चूंदड़ी ओढ़ाकर उन्हें तालाब से बाहर लेकर आए।

परिक्रमा के बाद बहनें तालाब के पानी में जाकर खड़ी हो गई, जिसके बाद भाई अपनी बहनों के पास पहुंचे और पानी पिलाया और चूंदड़ी ओढ़ाकर उन्हें तालाब से बाहर लेकर आए।

क्या है समुद्र मंथन की परम्परा राजस्थान में विशेष रूप से पाली और जालोर जिलों में एक अनूठी और पारंपरिक रस्म “समुद्र मंथन” निभाई जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में “समद डोवण” या “समुद्र मंथन की परंपरा” कहा जाता है। यह भाइयों और बहनों के बीच के रिश्ते को और मजबूत करती है। इस परंपरा में, भाई-बहन मिलकर एक तालाब के किनारे जल को हिलाते हैं (मंथन करते हैं), इसके बाद भाई अपनी बहन को चुनरी ओढ़ाते हैं और एक-दूसरे के सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। यह आयोजन अक्सर सैकड़ों या हजारों लोगों के इकट्ठा होने के साथ उत्सव जैसा माहौल बनाता है और कई सालों के अंतराल के बाद किया जाता है। प्रजापत समाज और अन्य समुदायों में इस परंपरा को लेकर खासा उत्साह देखा जाता है।

समुन्द्र मंथन की परम्परा के दौरान लोगों में उत्साह नजर आया।

समुन्द्र मंथन की परम्परा के दौरान लोगों में उत्साह नजर आया।

ऐसे निभाई जाती है परंपरा

  • तालाब पूजन और परिक्रमा: सबसे पहले, महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए सिर पर घड़ा लेकर तालाब की परिक्रमा और पूजन करती हैं।
  • तालाब का मंथन: भाई और बहन तालाब में एक घड़े से पानी को हिलाते हैं और इस प्रकार प्रतीकात्मक रूप से समुद्र मंथन की रस्म निभाते हैं।
  • ‘समद डोवण’ की रस्म: बहन भाई को तालाब का पानी पिलाती है और फिर भाई अपनी बहन को चुनरी ओढ़ाता है।
  • सुख-समृद्धि की कामना करते है: भाई-बहन इस अवसर पर एक-दूसरे के सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

इस परंपरा का महत्व

  • भाई-बहन के रिश्ते को मजबूत करना: यह परंपरा भाई-बहन के बीच के अटूट बंधन और स्नेह को दर्शाती है।
  • सांस्कृतिक विरासत को सहेजना: समुदाय इस परंपरा को अगली पीढ़ी को सौंपने और इसे जीवंत रखने का संकल्प लेता है।
  • सामाजिक जुड़ाव और उत्सव: इस आयोजन को देखने के लिए दूर-दराज के गांवों से हजारों लोग परिवार के साथ आते हैं, जिससे तालाब किनारे मेले जैसा माहौल बन जाता है।



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