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झालावाड़ के अकलेरा के मनोहर थाना ब्लॉक के पीपलोदी गांव में शुक्रवार को सरकारी स्कूल की छत ढह गई। हादसा उस वक्त हुआ था, जब स्कूल के सभी बच्चों को बारिश के कारण प्रार्थना सभा के लिए एक रूम में बैठा रखा था। हादसे में 7 बच्चों की मौत हो गई, 21 घायल है और

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पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

गांव का ही रहने वाला कपिल पुत्र रमेश उसी स्कूल में चौथी कक्षा में पढ़ता है। शुक्रवार सुबह 7 बजे वह स्कूल पहुंच गया था। बारिश के कारण प्रार्थना सभा के लिए सभी बच्चों को एक रूम में बैठा रखा था। वहां जाकर कपिल ने बैग चैक किया तो पता चला कि उसमें पेन नहीं था।

घर पास में ही था। ऐसे में उसने बैग उसी क्लासरूम में छोड़ा और स्कूल से घर आ गया। मम्मी से पैसे लेकर दुकान पर पेन लेने चला गया। वह पेन लेकर घर आया और वापस स्कूल गया। जैसे ही वह स्कूल के गेट पर पहुंचा, हादसा हो गया।

उसकी आंखों के सामने स्कूल की छत भरभराकर गिर गई। कपिल ने बताया कि जब मैं बैग क्लासरूम में रखकर पेन लेने जा रहा था, तब मैंने मीना मैडम को कहा था कि छत से कंकड़ गिर रहे हैं। इस पर मैडम ने कहा- कौवा फेंक रहा होगा। इसके बाद मैं तो पेन लेने चला गया।

हादसे में बाल-बाल बचा कपिल(बीच में), उसकी मां और बड़ा भाई आयुष(दाएं)।

हादसे में बाल-बाल बचा कपिल(बीच में), उसकी मां और बड़ा भाई आयुष(दाएं)।

बड़ा भाई भी स्कूल जाने की तैयारी में था कपिल का बड़ा भाई आयुष पांचवीं क्लास में पढ़ता है। वह भी स्कूल के लिए निकला नहीं था। वह तैयार होकर बैग जमाकर निकलने वाला था। इतने में ये हादसा हो गया।

कपिल की मां ने कहा कि स्कूल में रोज पानी टपकता था। बच्चे घर आकर बताते थे। कभी किसी ने ध्यान नहीं दिया।

मेरे बच्चे तो बच गए, लेकिन दूसरे बच्चों के साथ जो हुआ है, उसकी भरपाई नहीं हो सकती है।

किसी का इकलौता बेटा चला गया, किसी की राखी सूनी हो गई…

स्कूल में पढ़ने वाले दूसरे बच्चों की किस्मत कपिल और आयुष की तरह बुलंद नहीं थी। सरकारी सिस्टम की लापरवाही ने 7 जिंदगियां निगल लीं। वहीं 21 बच्चे अस्पताल में दर्द से तड़प रहे हैं।

इस जानलेवा लापरवाही में किसी ने अपने दो मासूम बच्चे खो दिए तो किसी बहन की राखी सूनी कर दी। किसी का इकलौता बेटा छीन लिया। भास्कर पीड़ित परिवारों के पास पहुंचा और उनका दर्द साझा किया…

हादसे के बाद अस्पताल में कोहराम मच गया था। घरवालों का रो रोकर बुरा हाल था।

हादसे के बाद अस्पताल में कोहराम मच गया था। घरवालों का रो रोकर बुरा हाल था।

टीचर बनना चाहता था हरीश पीपलोदी गांव का रहने वाला हरीश सातवीं कक्षा में पढ़ता था। शुक्रवार सुबह हंसता खेलता स्कूल गया था। फिर उसका लहूलुहान शव घर पहुंचा। हरीश टीचर बनना चाहता था। पिता बाबूलाल ने बताया- हरीश मुझसे कहता था कि मैं मास्टर बनूंगा। अब उसकी यादें ही रह गई हैं। मैं तो मजदूरी करने गया हुआ था। वहां हादसे का पता चला तो दौड़कर स्कूल पहुंचा। तब तक मेरा बेटा मुझे छोड़कर चला गया था। हादसे के बाद से हरीश की मां बेसुध हैं और कुछ भी नहीं बोल पा रही हैं।

हरीश के पिता बाबूलाल उसे याद कर बार-बार भावुक हो जाते हैं।

हरीश के पिता बाबूलाल उसे याद कर बार-बार भावुक हो जाते हैं।

झाड़ू लगाने के कारण खुद बच गई, लेकिन आंखों के सामने भाई खत्म आठवीं क्लास की लक्ष्मी भील तो हादसे में बच गई, लेकिन उसकी आंखों के सामने उसके भाई की मौत हो गई। लक्ष्मी का भाई कुंदन पांचवीं में पढ़ता था। शुक्रवार को दोनों भाई-बहन साथ स्कूल गए थे।

कुंदन क्लास रूम में जाकर बैठ गया। वहीं लक्ष्मी को टीचर ने झाड़ू लगाने को कहा। वो झाड़ू लगा रही थी, इतने में मलबा गिर गया। वो डरकर दूसरे कमरे की तरफ भागी। फिर भागकर मलबे की तरफ गई, जिसमें उसका भाई दब गया था।

लक्ष्मी ने बताया कि उनसे रोज स्कूल में झाड़ू पोंछा करवाया जाता था। गांव की चारू भील भी लक्ष्मी के साथ आठवीं क्लास में है। वो भी शुक्रवार सुबह झाड़ू लगा रही थी, जब स्कूल की छत भरभराकर गिर गई। वह तो बच गई, लेकिन सातवीं क्लास में पढ़ने वाली उसकी बहन की मौत हो गई।

घायल अरविंद की मां बोलीं- बच्चा चाहे अनपढ़ रह जाए, सरकारी स्कूल में नहीं भेजूंगी

हादसे का शिकार हुआ चौथी क्लास का अरविंद मनोहर थाना अस्पताल में भर्ती है। उसके पैर, पीठ पर चोट है। पास में बैठी मां बार-बार भगवान का नाम लेकर कह रही है कि मेरे बच्चे को बचा लिया।

मां धापू बाई ने बताया- मैं घर पर काम कर रही थी। सुबह सात बजे बेटे को तैयार करके स्कूल भेजा था। थोड़ी देर बाद पता लगा कि स्कूल की छत गिर गई। मैं भी भागकर स्कूल पहुंची।

मलबे से पहले चार लाशें निकलीं। मैं होश खो बैठी और चिल्ला-चिल्ला कर बच्चे को खोज रही थी। थोड़ी देर बाद मेरा बेटा मिला। उसकी सांस चल रही थी, तो मेरी जान में जान आई।

पूरी स्कूल के मास्टरों की लापरवाही है। बच्चों ने पहले ही बता दिया था, लेकिन स्कूल ने ध्यान नहीं दिया। आज मेरा बेटा उनकी वजह से इस हालात में है। अब चाहे बच्चा अनपढ़ रहे या ज्यादा मेहनत कर प्राइवेट स्कूल में पैसे देकर पढ़ाना पढ़ें, लेकिन सरकारी स्कूल में नहीं भेजूंगी।

हादसे के बाद स्कूल परिसर में फैला मलबा।

हादसे के बाद स्कूल परिसर में फैला मलबा।

हाथ पकड़कर स्कूल ले गई थी भाई को, हादसे में साथ छूटा हादसे में पीपलोदी गांव के रहने वाले कार्तिक की मौत हो गई। कार्तिक और उसकी दो बहनें इसी स्कूल में पढ़ती थी। कार्तिक घर में सबसे छोटा था। शुक्रवार सुबह सात बजे तीनों स्कूल गए थे। हादसे में दो बहनें घायल हो गईं और कार्तिक की मौत हो गई। बेटे की मौत का पता चलते ही पिता हरक चंद की भी तबीयत बिगड़ गई। घायल दोनों बेटियों के साथ वो भी अस्पताल में भर्ती है। एक बेटी झालावाड़ गंभीर हालत में है और दूसरी मनीषा मनोहर थाना अस्पताल में है।

पिता हरक चंद ने बताया कि उनके तीन बच्चों में कार्तिक सबसे छोटा था, चौथी में पढ़ता था। मनीषा सातवीं और आरती छठी क्लास में पढ़ती है। मनीषा बार-बार मम्मी से पूछती है-भाई को क्या हो गया? मैं राखी किसको बांधूंगी?

दोनों क्लासरूम में लगा रहता था ताला स्कूल के टीचर बद्री लाल से भी भास्कर ने बात की। उन्होंने बताया कि उनकी ड्यूटी 25 जुलाई को दूसरी जगह थी तो वे वहां थे। उन्हें 7.45 बजे हादसे की जानकारी मिली, जिसके बाद वे स्कूल पहुंचे। उन्होंने कहा कि दोनों कमरों को बंद ही रखते थे। जर्जर बिल्डिंग की बात से वह इनकार रह रहे हैं। इधर स्कूल प्रिंसिपल से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कॉल नहीं उठाया।

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दिखाने की कोई चीज है तो वह है दया, क्लास रूम की दीवार पर लिखी ये लाइन झालावाड़ जिले के पिपलोदी गांव के बच्चे रोज पढ़ते थे। उन्हें क्या पता था सरकारी सिस्टम के पास दया नहीं होती। हां, दिखाने के लिए घड़ियाली आंसू जरूर होते हैं, जो हर हादसे के बाद जमकर बहाए जाते हैं। पढ़ें पूरी खबर…



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