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त्रिपुरा की राजधानी अगरतला स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के एकलव्य परिसर में बौद्ध दर्शन एवं पालि विद्या शाखा की ओर से पन्द्रह दिवसीय राष्ट्रीय पाण्डुलिपि विज्ञान और लिप्यंतरण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें देशभर से आए शोधार्थियों और विद्व

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कार्यशाला के संयोजक और पालि विद्याशाखा प्रमुख डॉ. उत्तम सिंह ने बताया कि पन्द्रह दिनों के दौरान प्रतिभागियों को अलग-अलग लिपियों की जानकारी दी गई। साथ ही चार अप्रकाशित ग्रंथों की करीब 350 पन्नों की पाण्डुलिपियों का लिप्यन्तरण भी कराया गया। प्रतिभागियों ने इसे अपने लिए बेहद उपयोगी और यादगार अनुभव बताया।

कार्यशाला में जयपुर के विद्वान भी हुए शामिल।

कार्यशाला में जयपुर के विद्वान भी हुए शामिल।

पाण्डुलिपियों में सुरक्षित है भारत का ज्ञान

समारोह को संबोधित करते हुए पाण्डुलिपि विद्या के विद्वान प्रो. वसंत कुमार भट्ट ने बताया कि संस्कृत ग्रंथों पर समय-समय पर आक्रमण हुए और कई पाण्डुलिपियां विदेश चली गईं। अंग्रेज भारत से अनेक ग्रंथ अपने साथ ले गए, जिनमें से सर विलियम जॉन्स ने 1789 में ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ का अंग्रेजी अनुवाद किया। उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा इन्हीं पाण्डुलिपियों में सुरक्षित है। अब पाठ यात्रा शुरू होने जा रही है और हमें पाण्डुलिपियों के अध्ययन और लिप्यन्तरण को आगे बढ़ाना चाहिए।

शोधकर्ताओं को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।

शोधकर्ताओं को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया।

भारत सरकार का ज्ञान भारतम् मिशन

प्रो. भट्ट ने बताया कि पाण्डुलिपियों को खोजने और संरक्षित करने के लिए भारत सरकार ने ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ शुरू किया है। संस्कृत विषय में यह पाण्डुलिपि विज्ञान और लिप्यन्तरण शोध का अहम क्षेत्र बन चुका है और भविष्य में इसमें रोजगार के अवसर भी उपलब्ध होंगे।

समापन अवसर पर मां सरस्वती के सामने दीप जलाकर आराधना की गई और शोधार्थी दीपाली व प्रियंका ने पीपीटी के माध्यम से पूरी कार्यशाला की रिपोर्ट प्रस्तुत की।



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