मध्यप्रदेश और राजस्थान के बीच चीता कॉरिडोर विकसित करने का मामला खटाई में पड़ता दिख रहा है। दोनों राज्यों के बीच इसे लेकर एमओयू होना था लेकिन मध्यप्रदेश ने ऐन मौके पर यू-टर्न ले लिया। एमपी के अफसरों का कहना है कि फिलहाल इसकी जरूरत नहीं है। वहीं, राजस्थ
दरअसल, पिछले साल जून में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच चीता कॉरिडोर को लेकर चर्चा हुई थी। इसकी पहल एमपी के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की तरफ से की गई थी। उन्होंने राजस्थान के सीएम से कहा था कि टाइगर हम संभालेंगे, चीता आप संभालो। इसके बाद इस कॉरिडोर पर राजस्थान की तरफ से तेजी से काम शुरू हुआ।
राजस्थान ने न केवल बजट सत्र में इसका ऐलान किया बल्कि वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट से अनुरोध कर कॉरिडोर के लिए सर्वे भी कराया। इतना सब होने के बाद एमपी चीता कॉरिडोर प्रोजेक्ट से पीछे क्यों हट रहा है? क्या है इसकी असल वजह? पढ़िए, रिपोर्ट…

पहले जानिए, एमपी ने कैसे लिया यू-टर्न? 23 जून को राजस्थान के सीएम हाउस में स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड की 15वीं मीटिंग थी। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा इसकी अध्यक्षता कर रहे थे। इस बैठक के लिए मध्यप्रदेश वन विभाग के अफसरों को भी बुलाया गया था। राजस्थान सरकार इस मीटिंग में चीता कॉरिडोर के लिए एमपी के अफसरों के साथ एमओयू साइन करना चाहती थी।
मीटिंग काफी देर तक चली लेकिन एमपी के अफसर नहीं पहुंचे। सूत्र बताते हैं कि राजस्थान के अफसरों ने एमपी के अफसरों को मीटिंग से दो दिन पहले कॉल कर मीटिंग और एमओयू की सूचना दी थी। उस वक्त एमपी के अफसरों ने मीटिंग में शामिल होने की सहमति दी थी।

23 जून को जयपुर में सीएम हाउस में हुई स्टेट वाइल्ड लाइफ बोर्ड की मीटिंग में अफसरों के साथ सीएम भजनलाल शर्मा।
राजस्थान के अफसर बोले- दोबारा संपर्क किया भास्कर ने जब इस मामले में राजस्थान पीसीसीएफ शिखा मेहरा से बात की तो उन्होंने कहा- 23 जून की मीटिंग में एमपी के अफसर नहीं पहुंचे तो हमने उन्हें कॉल किया। पता चला कि मप्र के मुख्यमंत्री की तरफ से कुछ आपत्ति है।
उन्होंने कहा कि इस मामले में एमपी के अफसर ही ज्यादा बता सकते हैं। उन्होंने ये भी बताया कि एमओयू के लिए राजस्थान तैयार है। मप्र के अफसरों को दोबारा इसके लिए संपर्क किया गया है।

अब जानिए, चीता कॉरिडोर बनाने की पहल कैसे हुई और एमपी क्यों पीछे हटा?
आप हमारे चीता की चिंता करो, हम आपके टाइगर की सुरक्षा करेंगे ये बात मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने राजस्थान के सीएम भजनलाल शर्मा से कही थी। दरअसल, 30 जून 2024 को पार्वती-कालीसिंध-चंबल लिंक प्रोजेक्ट का एमओयू करने राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भोपाल आए थे। इस दौरान मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ चीता कॉरिडोर को लेकर बात हुई थी।
सीएम डॉ. मोहन यादव ने कहा था कि रणथंभौर का टाइगर अगर घूमते हुए हमारे यहां आ जाता है तो हम ढूंढते हैं कि ये कहां से आ गया। ऐसे ही चीते की बात करें तो हमारा चीता आपके यहां पहुंच जाता है। सीएम डॉ. यादव ने दोनों वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर राजस्थान के सीएम भजनलाल शर्मा के सामने प्रस्ताव रखा था कि हमारे चीते की चिंता आप करो, आपके टाइगर की सुरक्षा हम करेंगे।
राजस्थान के सीएम ने भी कहा था- हमारे पड़ोस में चीता है। हमारे रणथंभौर के टाइगर आपके यहां आ जाते हैं। इस तरह की योजना बने कि जहां टाइगर है, वहां टाइगर रहे और जहां चीता है, वहां चीता रहे।
डॉ. यादव ने यह भी कहा था कि बायोडायवर्सिटी का फायदा दोनों राज्य एक-दूसरे से कैसे उठा सकते हैं, इस पर भी काम करने की जरूरत है।

30 जून 2024 को भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में पार्वती-कालीसिंध-चंबल प्रोजेक्ट की शुरुआत करते हुए दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री।
भजनलाल सरकार ने बजट में की चीता कॉरिडोर की घोषणा एमपी के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से आश्वासन मिलने के बाद राजस्थान के सीएम भजनलाल ने इसी साल बजट सत्र के दौरान इस कॉरिडोर की घोषणा कर दी। 30 अप्रैल 2025 को मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जयपुर के दौरे पर गए थे। तब उन्होंने कहा था कि यह चीता प्रोजेक्ट एशिया में अनूठा है। हमारे लिए यह खुशी की बात है कि चीता हमारे यहां सर्वाइव कर रहा है। यह विश्व के सर्वाधिक सफल होने वाले प्रोजेक्ट्स में से एक है।
राजस्थान के साथ संबंधों पर बात करते हुए मोहन यादव ने कहा था कि दोनों राज्य नदी जोड़ो अभियान के तहत पार्वती-कालीसिंध-चंबल परियोजना (पीकेसी-ईआरसीपी) पर काम कर रहे हैं। उम्मीद है कि दोनों राज्य पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सभी प्रकार के कामों को लेकर आगे बढ़ेंगे।

कॉरिडोर के लिए WWI कर चुका सर्वे वन विभाग के सूत्रों का कहना है कि चीता कॉरिडोर प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले विशेषज्ञों की टीम राजस्थान के जंगलों में संभावनाएं तलाश चुकी हैं। वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट (डब्ल्यूआईआई) से वन्यजीव वैज्ञानिक यदुवेन्द्र देवसिंह झाला ने शेरगढ़, भैंसरोडगढ़, मुकंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व और गांधीसागर के जंगलों का भी निरीक्षण किया था।
वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट डॉ. कृष्णेंद्र सिंह नामा बताते हैं- चीता कॉरिडोर का जो प्रोजेक्ट है, उसमें राजस्थान का बड़ा अहम रोल है। कूनो से गांधी सागर तक फैले इस प्रोजेक्ट में राजस्थान का शेरगढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी का हिस्सा आता है। इसके बाद सोरसन ग्रासलैंड, सावन भादो और फिर झालावाड़ का कुछ हिस्सा आता है और उसके बाद एमपी का गांधी सागर का एरिया आता है।
ये एक बहुत ही अच्छा जियोग्राफिकल पार्ट है और चीतों की वंशवृद्धि और उनकी ब्रीडिंग के लिए एक अच्छा हैबिटेट अवेलेबल करवाता है। इस पूरे एरिया में ओपन ग्रासलैंड है, जिसे चीतों का नेचुरल हैबिटेट कहा जाता है। चीता एक ग्रासलैंड एनिमल है। इन्हें अफ्रीका के जिस एरिया से लाया गया है, वहां भी ओपन ग्रासलैंड एरिया है।

वो 2 कारण, जिसकी वजह से पीछे हटा एमपी
1. एमपी को चीते वापस न लौटने का डर एमपी के अफसरों का चीता कॉरिडोर से फौरी तौर पर पीछे हटने का ये सबसे बड़ा कारण है। दरअसल, चीता खुद ही अपना कॉरिडोर तैयार कर रहे हैं। पिछले डेढ़ साल में तीन चीते पड़ोसी राज्य राजस्थान के 3 जिलों में जा चुके हैं। कूनो की टीम को इन्हें रेस्क्यू कर वहां से वापस लाना पड़ा है।
इसी महीने 11 अगस्त को कूनो से निकलकर मादा चीता ज्वाला चंबल नदी पार कर राजस्थान के सवाईमाधोपुर जिले की सीमा में पहुंच गई थी। एमपी और राजस्थान बॉर्डर से ये इलाका करीब 30 किमी दूर है। कूनो की टीम 12 अगस्त को सवाईमाधोपुर जिले की खंडार तहसील के करीरा ग्राम से ज्वाला को रेस्क्यू कर वापस ले आई।

गांव में चीता आने की सूचना मिलने पर रणथंभौर टाइगर रिजर्व की टीम मौके पर पहुंची और बकरी को वहां से हटाया।
पिछले साल करौली पहुंच गया था पवन ये घटना 4 मई 2024 की है। कूनो नेशनल पार्क से चीता पवन करीब 50 किलोमीटर दूर करौली जिले में पहुंच गया था। करौली के सिमार में उसका मूवमेंट मिलने के बाद एमपी के कूनो से आई टीम ने पवन को ट्रेंक्युलाइज किया था। चीता पवन 10 घंटे तक चंबल से सटे जंगलों में घूमता रहा।
हालांकि, 27 अगस्त 2024 को पवन की कूनो पार्क की सीमा में ही नाले में डूबने से मौत हो गई थी। इससे पहले 26 दिसंबर 2023 को चीता अग्नि राजस्थान के बारां जिले की सीमा में पहुंच गया था। जिसके बाद कूनो की टीम उसे ट्रेंक्युलाइज कर वापस कूनो ले आई।

अफसरों ने सीएम से कहा- अभी जरूरत नहीं है भारत में चीतों की संख्या 31 हो चुकी है। अप्रैल के महीने में कूनो की मादा चीता निर्वा ने एक साथ 5 शावकों को जन्म दिया। इस तरह कूनो नेशनल पार्क में 19 शावक और 10 व्यस्क चीते मौजूद हैं। दो चीते पावक और प्रभाष को गांधीसागर अभयारण्य में छोड़ा गया है। साल 2022 में जब चीता प्रोजेक्ट शुरू हुआ तो नामीबिया-दक्षिण अफ्रीका से 20 चीतों को लाया गया था।
एक साल के भीतर 40 फीसदी चीतों की मौत हो गई थी। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट भी चिंता जता चुका था। हालांकि, केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा कि नई जगह पर 50 फीसदी चीतों की मौत सामान्य है। बहरहाल, जिस हिसाब से चीतों की ग्रोथ होना चाहिए, वैसी अभी नहीं हुई है। चीते कूनो छोड़कर राजस्थान जा रहे हैं, ऐसे में अफसरों को लगता है कि शायद चीते वहां जाकर वापस ही न लौटें।
सूत्रों का कहना है कि अफसरों ने मुख्यमंत्री को बताया है कि जब कूनो में चीतों की संख्या में इजाफा हो जाएगा, तब कॉरिडोर के बारे में विचार किया जा सकता है। भास्कर ने जब वन विभाग के एसीएस अशोक बर्णवाल से इसे लेकर बात की तो उन्होंने कहा-

फिलहाल चीता कॉरिडोर की जरूरत मध्यप्रदेश को महसूस नहीं होती।


2. राजस्थान वन विभाग ने प्री बेस (भोजन) तैयार किया वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट डॉ. कृष्णेंद्र सिंह नामा बताते हैं कि राजस्थान के जिन इलाकों से चीता कॉरिडोर प्रस्तावित है, वहां इंसानी दखल काफी कम है। इससे ह्यूमन-चीता कनफ्लिक्ट की संभावना काफी कम हो जाती है। साथ ही यहां चीतों के लिए प्री-बेस यानी उनके लिए भोजन की कमी नहीं है।
राजस्थान वन विभाग ने शेरगढ़ वाइल्डलाइफ सेंचुरी और भैंसरोडगढ़ सेंचुरी में ग्रासलैंड डेवलप किया है। इसका नतीजा ये हुआ कि यहां चिंकारा, ब्लैक बक और चीतल की संख्या में इजाफा हुआ है। ये सभी चीतों का पसंदीदा भोजन है। साथ ही चंबल किनारे बने इस कॉरिडोर की वजह से साल भर पानी की कमी नहीं होगी।

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