जोधपुर के खेजड़ली गांव में बुधवार को महिलाएं सोने की ज्वेलरी से लदी नजर आईं। इनमें महिला अधिकारी से लेकर बिजनेसमैन की बहू तक शामिल थीं। मौका था खेजड़ी के पेड़ बचाने के लिए 295 साल पहले 363 लोगों के बलिदान को याद करने का। यहां महिलाएं 50-50 लाख तक के गहन
जोधपुर से 22 किमी दूर खेजड़ली गांव में पर्यावरण के प्रति प्रेम दर्शाने के लिए हर साल मेला भरता है। मंगलवार को मेले में बड़ी संख्या में बिश्नोई समाज के लोग शामिल हुए। सुबह से ही लोगों की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी।

जोधपुर के खेजड़ली गांव में मेले में महिलाएं सोने के गहनों से सजकर पहुंचीं।
हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश से भी आए लोग जोधपुर, फलोदी, नागौर, बीकानेर, सांचौर, जालोर, पाली सहित विभिन्न जिलों में रहने वाले लोग मेले में शामिल हुए। इसके अलावा हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश से भी लोग आए और शहीदों को नमन किया। यहां खेजड़ली में बिश्नोई समाज के आराध्य जम्भेश्वर भगवान का मंदिर बनाया गया है। एक दिन पहले मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा की गई थी।
लोगों ने हवन कुंड में नारियल की आहुतियां देकर शहीदों को नमन किया। मेले के चलते शहीद स्थल के दोनों तरफ के प्रमुख रास्तों पर करीब 2 किलोमीटर लंबा जाम लग गया।
अब जानिए महिलाएं कौनसे गहने पहनकर पहुंचीं…

नर्सिंग ऑफिसर मंजू बिश्नोई खेजड़ली के मेले में सोने के गहने पहनकर पहुंचीं।
नर्सिंग ऑफिसर ने 50 तोला सोने के गहने पहने नर्सिंग ऑफिसर मंजू बिश्नोई ने बताया कि मैं 30 साल की हूं। जितना याद है, मम्मी मुझे 2 साल की उम्र से ही इस मेले में लेकर आ रही हैं। आज मैंने लगभग 50 तोला सोने के गहने पहने हैं। इनकी कीमत नहीं पता, क्योंकि ये गहने घरवालों ने बनवाए हैं।
पार्वती बिश्नोई ने बताया यह मेरी संस्कृति का हिस्सा है। इसलिए वे गहने पहनकर आती हैं। वे गहने इसलिए बनवाती हैं, ताकि मेले में उन्हें पहन सकें। मैंने लगभग 40 से 50 तोला सोना के गहने पहने हैं।
जोधपुर के धवा गांव से आई महिला ने बताया- वह बचपन से ही इस मेले में आ रही है और आभूषण पहनना बिश्नोई समाज की पहचान और शान है।
295 साल पुराना पर्यावरण आंदोलन बिश्नोई समाज की संस्थान के मीडिया प्रवक्ता ओमप्रकाश लोल ने बताया- जोधपुर के महाराजा अभयसिंह के शासनकाल में खेजड़ली गांव से खेजड़ी वृक्षों की कटाई का आदेश दिया गया था। अमृता देवी ने सिर सांठे रूंख रहे तो भी सस्तों जांण का नारा देकर पेड़ से चिपककर विरोध किया और शहीद हो गईं।
अमृतादेवी राज्य जीव जंतु कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष जसवंत सिंह बिश्नोई ने बताया कि गुरु जम्भेश्वर भगवान की वाणी का पालन करते हुए 363 बिश्नोई महिला-पुरुषों ने बलिदान दिया था। राजस्थान सरकार ने ईको टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए यहां शहीदों की नामावली के शिलालेख लिखवाए हैं।

मेले में पहुंची महिलाओं ने खेजड़ली के शहीदों की कहानी के बारे में बताया।
खेजड़ली मेला: अब 4 पॉइंट में समझिए, क्या है मान्यता
- खेजड़ली शहीदी मेला दुनिया में सबसे अनूठा है। 21 सितंबर 1730 को अमृता देवी के नेतृत्व में 363 महिला-पुरुषों ने पेड़ों को बचाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। उनकी याद में यह मेला लगता है। भादो की दशमी को खेजड़ली मेला जोधपुर के खेजड़ली गांव में लगता है।
- मारवाड़ जोधपुर के महाराजा अभय सिंह नया महल बनवा रहे थे। महल निर्माण के लिए लकड़ियों की जरूरत पड़ी थी। महल से 24 किलोमीटर दूर खेजड़ली से पेड़ काटकर लाने का हुक्म हुआ था। सैनिक खेजड़ली गांव में पहुंच गए थे। रामू खोड़ के घर के बाहर लगा खेजड़ी का पेड़ काटने लगे तो रामू की पत्नी अमृता देवी ने विरोध किया। वह पेड़ से चिपक गईं। सैनिकों ने उन्हें कुल्हाड़ी से काट दिया था।
- इसके बाद अमृता देवी की तीनों बेटियों आसू, रत्नी और भागू बाई भी एक-एक पेड़ को बचाने के लिए लिपट गईं। सैनिकों ने उन्हें भी काट दिया था। यह बात पूरे गांव में फैली तो लोग खेजड़ी के पेड़ों से लिपट गए थे। राजा के सैनिकों ने 71 महिलाओं और 292 पुरुषों यानी कुल 363 लोगों को काट डाला।
- महाराजा अभय सिंह तक यह बात पहुंची तो उन्होंने पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी और बिश्नोई समाज को लिखित में वचन दिया कि मारवाड़ में कभी खेजड़ी का पेड़ नहीं काटा जाएगा। इस दिन की याद में खेजड़ली में हर साल शहीदी मेला लगता है। वन्यजीवों को बचाने में भी बिश्नोई समाज हमेशा आगे रहा है। हिरणों को बचाने के प्रयास में समाज के कई लोग शिकारियों की गोली का शिकार हो चुके हैं।
अब देखिए मेले से जुड़ी तस्वीरें…

मेले में पहुंची सरोज ने बताया कि बचपन से इस मेले में आ रही है।

मेले में राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों में महिलाएं पहुंचीं।

पेड़ों को बचाने के लिए 363 महिला-पुरुषों ने कुर्बानी दी थी। इसी की याद में मेला लगाया जाता है।

समाज के लोगों ने हवन कुंड में नारियल की आहुतियां देकर शहीदों को नमन किया।

मेले में पहुंची महिलाओं ने बताया कि गहने पहनना बिश्नोई समाज की पहचान और शान है।

मेले में पुरुष भी पारंपरिक ड्रेस में नजर आए।
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