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राजस्थान हाईकोर्ट ने एक फैसले में मोटर दुर्घटना के मामले में पीड़ित परिवार को मिलने वाला मुआवजा लगभग आठ गुना बढ़ा दिया है। जस्टिस रेखा बोराणा की कोर्ट ने मंगलवार को दिए अपने फैसले में मूल मुआवजा राशि 7,88,692 रुपये से बढ़ाकर 68,51,328 रुपये करने का आ

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यह मामला 9 जनवरी 2014 को बालेसर के शहीद भंवरसिंह चौराहे के पास हुई सड़क दुर्घटना का है, जिसमें ढलाराम माली की मौत हो गई थी। ढलाराम अपनी मोटरसाइकिल पर बलेसर से अपने गांव कुई इंदा जा रहे थे, जब दोपहर करीब 1 बजे बोलेरो गाड़ी ने तेज रफ्तार और लापरवाही से पीछे से टक्कर मार दी।

ट्रिब्यूनल ने वास्तविक स्थिति समझने में की गलती

इस प्रकरण में मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल फर्स्ट जोधपुर ने 23 जुलाई 2018 को अपने फैसले में ढलाराम की मासिक आय 4,914 रुपए मानकर 7,88,692 रुपए मुआवजा निर्धारित किया था। इसे ढलाराम की पत्नी व अन्य आश्रितों ने फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि “ट्रिब्यूनल ने ढलाराम को अकुशल मजदूर मानने की गलती की है। जबकि रिकॉर्ड पर पर्याप्त साक्ष्यों से स्पष्ट है कि मृतक कारोबार में संलग्न था।

खुद के पास थी माइन्स, क्रेन, ट्रैक्टर

धलाराम की विधवा इमरती देवी ने बताया कि उसका पति सक्रिय रूप से खनन कार्य में थे। उनके पास एक खदान थी और दूसरी सुशीला मीठालाल से लीज पर ली थी। इमरतीदेवी की ओर से अपने बयान की पुष्टि के लिए खुद की क्रेन का रजिस्ट्रेशन डॉक्यूमेंट, बैंक का लोन स्टेटमेंट और बैंक पासबुक भी प्रस्तुत की। इसमें क्रेन के लोन की किश्त के रूप में 35170 रुपए हर महीने चुकाने की पुष्टि हो रही थी।

खुद की माइन्स होने की पुष्टि राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सहमति आदेश से हुई, जिसमें पता चला कि 2011 और 2014 में धलाराम को खनन कार्य करने की वैधानिक अनुमति दी गई थी। ढलाराम के बैंक रिकॉर्ड दर्शाता है कि ये भुगतान 21 दिसंबर 2013 तक, यानी एक्सिडेंट में उनकी मौत 9 जनवरी 2014 से एक महीने पहले तक किए गए थे।

हाईकोर्ट- साक्ष्य अनदेखे कर आय सिर्फ 4914 मानना गलत

कोर्ट ने दस्तावेजी साक्ष्य के आधार पर कहा: “इस कोर्ट की विवेकाधीन राय है कि नियमित आधार पर भारी लोन किश्तों को चुकाने की क्षमता, चुकाई गई देनदारी से काफी अधिक आय के अस्तित्व को दर्शाती है। दिए गए तथ्यों में, यह मानना पूर्णतः अवास्तविक होगा कि 35,000 रुपए से ज्यादा ईएमआई चुकाने वाला व्यक्ति केवल 4,914 रुपये माह की तुच्छ आय पर निर्वाह कर रहा था”।

इतनी सी आय में छह सदस्यीय परिवार का भरण पोषण भी संभव नहीं है। कोर्ट ने कहा – “बैंक लेनदेन से प्रमाणित वित्तीय व्यय मृतक की कमाई क्षमता का मजबूत परिस्थितिजन्य प्रमाण है। फलस्वरूप, यह न्यायालय उचित समझता है कि मृतक की मासिक आय निश्चित रूप से ईएमआई भुगतान से अधिक थी”।

कृषि आय का मूल्यांकन

कृषि आय के संबंध में एडब्ल्यू-2 ने बताया कि खनन गतिविधियों के अलावा उसका पति कृषि गतिविधियों में भी संलग्न था और अतिरिक्त 10,000 रुपये मासिक कमाता था। जमाबंदी (प्रदर्शी 26ए) से पता चला कि धलाराम के पास 0.08 बीघा कृषि भूमि संयुक्त स्वामित्व में थी जिसमें ट्यूबवेल भी शामिल था ।

हाईकोर्ट ने कहा: “कृषि का पेशा ही क्षेत्र में हाल के विकास को देखते हुए वैज्ञानिक ज्ञान की आवश्यकता होती है। अतः कृषक को अकुशल मजदूर के समान नहीं माना जा सकता”।

कोर्ट- ईएमआई भी कमाई क्षमता का प्रमाण

हाईकोर्ट ने गुरप्रीत कौर बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड 2022 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि “जहां कोई मृतक नियमित रूप से पर्याप्त लोन किश्त चुका रहा था, वहां यह तथ्य कमाई क्षमता का विश्वसनीय प्रमाण है और न्यायालयों को आंख बंद करके न्यूनतम मजदूरी अधिसूचनाओं का सहारा नहीं लेना चाहिए”।

संशोधन- 4914 नहीं, 45 हजार कमाता था

न्यायालय ने सभी परिस्थितियों को देखते हुए कहा: “इस न्यायालय की विवेकाधीन और स्पष्ट राय है कि मृतक की मासिक आय का मूल्यांकन उसकी आजीविका की कई धाराओं का संश्लेषण करके किया जाना चाहिए। इस न्यायालय का निष्कर्ष है कि मृतक अपने खनन और कृषि उद्यमों से कम से कम 45,000 रुपये मासिक कमाता था”।

संशोधित गणना में भविष्य की संभावनाओं में 25 प्रतिशत वृद्धि और व्यक्तिगत खर्च के लिए एक चौथाई कटौती के बाद मासिक आय 42,188 रुपये आंकी गई। 49 साल की उम्र के लिए गुणक 13 लगाकर आय की हानि 65 लाख 81 हजार 328 रुपए निकली।

कंसोर्टियम मुआवजे में वृद्धि

हाईकोर्ट ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी 2017 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार कंसोर्टियम हेड के तहत प्रत्येक अपीलकर्ता दावेदार को 40,000 रुपये देने का आदेश दिया। इस तरह अपीलकर्ता संख्या 2 से 6 तक (बच्चे और मां) भी कंसोर्टियम हेड के तहत 40,000 रुपये प्रत्येक के हकदार हैं।

कोर्ट ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को निर्देश दिया कि वह आदेश की प्रति प्राप्त होने के दो महीने के भीतर बढ़ी हुई मुआवजा राशि 60 लाख 62 हजार 636 रुपए ट्रिब्यूनल में जमा करे। इस राशि पर दावा दायर करने की तारीख 19 जून 2014 से 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज मिलेगा। यदि निर्धारित समय में राशि जमा नहीं की गई] तो कोर्ट के आदेश की तारीख से वास्तविक वसूली तक 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लगेगा।



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