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राजस्थान हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों के अदालतों में गवाही के लिए नहीं पहुंचने पर नाराजगी जताते हुए राजस्थान पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को स्पष्टीकरण देने के निर्देश दिए हैं। जस्टिस फरजंद अली ने गुरुवार को कुलदीपसिंह की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए
दरअसल, राज्य सरकार के वकील ने कोर्ट में बताया कि ट्रायल कोर्ट के बार-बार प्रयासों के बावजूद अभियोजन के गवाह, विशेषकर पुलिस अधिकारी, जो रिकवरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, कोर्ट में गवाही देने नहीं आ रहे। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ पुलिस अधिकारियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट तक जारी किए गए हैं, लेकिन उन वारंटों को भी अमल में नहीं लाया गया है।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: “अत्यंत दुखदायी और निंदनीय स्थिति’
हाईकोर्ट ने पुलिस अफसरों के इस व्यवहार को “अत्यंत दुखदायी और निंदनीय स्थिति” करार देते हुए कहा कि जो पुलिस अधिकारी खुद आपराधिक मामलों में कानूनी प्रक्रिया को लागू करने के लिए बाध्य हैं, वे ही कानूनी प्रक्रिया का खुलेआम उल्लंघन कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब अदालत द्वारा जारी गिरफ्तारी वारंट को सिर्फ इसलिए अमल में नहीं लाया जाता, क्योंकि संबंधित व्यक्ति पुलिस अधिकारी है।
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा, “यह तथ्य कि एक सेवारत पुलिस अधिकारी, जो राज्य में किसी स्थान पर तैनात है और सार्वजनिक कर्तव्य निभा रहा है, उसके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट होने के बावजूद उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता, यह न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास हिला देता है और समाज का विधि व्यवस्था पर से भरोसा उठा देता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए इससे शर्मनाक कोई बात नहीं हो सकती।”
डीजीपी हर जिले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त करें
हाईकोर्ट ने गणेशराम बनाम राजस्थान राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि इस कोर्ट की समन्वयक खंडपीठ ने पहले ही निर्देश दिया था कि पुलिस गवाहों को जारी समन और वारंट के पालन को सुनिश्चित करने के लिए डीजीपी हर जिले में एक नोडल अधिकारी नियुक्त करें।
कोर्ट के अनुसार, यह नोडल अधिकारी सर्कल इंस्पेक्टर से कम रैंक का नहीं होना चाहिए और वह पुलिस गवाहों की समन की पालना सुनिश्चित करने और अदालतों के समक्ष उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होना चाहिए। ट्रायल कोर्ट को ऐसे नोडल अधिकारी को सीधे समन भेजने का अधिकार दिया गया था और अनुपालन न करने की स्थिति में उक्त अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना था।
डीजीपी को दिए विशेष निर्देश
कोर्ट ने डीजीपी से स्पष्टीकरण मांगा है कि उनके अधीनस्थ अधिकारी लगातार अपने वैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफल क्यों हो रहे हैं और एक पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी वारंट के बावजूद गिरफ्तार क्यों नहीं किया जा सका। इसके लिए डीजीपी हलफनामा पेश करें, जिसमें इन बिंदुओं की जानकारी विशेष रूप से देनी होगी –
- क्या गणेशराम मामले में दिए गए निर्देशों को पत्र और भावना के अनुसार लागू किया गया है?
- यदि हां, तो संबंधित समय पर संबंधित जिले में नामित नोडल अधिकारी कौन था?
- ट्रायल कोर्ट की प्रक्रिया की पालना सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं?
- अदालत के आदेशों की इस तरह की स्पष्ट अवज्ञा के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अवमानना कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए?
इसके साथ ही कोर्ट ने महाधिवक्ता सह अतिरिक्त महाधिवक्ता दीपक चौधरी को निर्देश दिया है कि वे तत्काल इस आदेश को राजस्थान के डीजीपी को भेजें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हलफनामा अगली सुनवाई की तारीख पर या उससे पहले दाखिल किया जाना चाहिए। इस मामले में अगली सुनवाई 12 सितंबर को तय की गई है।
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