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राजस्थान हाईकोर्ट ने प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से नियुक्त कॉन्ट्रैक्चुअल कर्मचारियों को बड़ी राहत देते हुए स्पष्ट किया कि राजस्थान कॉन्ट्रैक्चुअल हायरिंग टू सिविल पोस्ट्स रूल्स 2022 का लाभ देने का फैसला सुनाया है। जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण और जस्टिस बि

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मामला मुख्यत: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत डेटा एंट्री ऑपरेटर और कंप्यूटर ऑपरेटर के पदों पर प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों से संबंधित था। ऐसी ही कुल 19 याचिकाओं पर यह संयुक्त फैसला दिया गया है। इनमें से एक याचिका में 106 सहित सभी में 22 जिलों से कुल 296 याचिकाकर्ता शामिल थे। जो जोधपुर, नागौर, झालावाड़, बीकानेर, डूंगरपुर, भीलवाड़ा, पाली, उदयपुर, हनुमानगढ़, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, जैसलमेर, चूरू, जालौर आदि जिलों से हैं।

राज्य सरकार की दलील

राज्य सरकार का तर्क था कि केवल सीधे सरकारी विज्ञापन के माध्यम से नियुक्त कॉन्ट्रैक्चुअल कर्मचारियों को ही 2022 के नियमों का लाभ मिलेगा। प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से नियुक्त कर्मचारियों को इन नियमों के दायरे में नहीं लाया जाएगा। सरकार ने 5 जनवरी 2023 के निर्देश का हवाला देते हुए कहा था कि “एजेंसी के माध्यम से अथवा जॉब बेसिस पर कार्यरत कर्मचारियों को इन नियमों के अंतर्गत नहीं लिया जाएगा।”

कोर्ट ने चार शर्तों का उल्लेख कर खारिज की सरकार की दलील

वहीं, कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि 2022 के नियमों के नियम 3 में चार शर्तें निर्धारित हैं: पहली, पद प्रशासनिक विभाग द्वारा बनाया गया हो; दूसरी, वित्त विभाग की सहमति हो; तीसरी, सार्वजनिक विज्ञापन के माध्यम से चयन हुआ हो; और चौथी, व्यक्ति कॉन्ट्रैक्ट आधार पर काम कर रहा हो। कोर्ट ने कहा कि इन नियमों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कॉन्ट्रैक्ट के बीच कोई अंतर नहीं किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

हाईकोर्ट ने मंगलौर गणेश बीड़ी वर्क्स बनाम भारत संघ के सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि कल्याणकारी कानून के तहत मुख्य नियोक्ता पर दायित्व लगाया जा सकता है, भले ही कर्मचारी की नियुक्ति ठेकेदार के माध्यम से हुई हो। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि 2022 के नियम कल्याणकारी प्रकृति के हैं और इनका उद्देश्य कॉन्ट्रैक्चुअल कर्मचारियों की स्थिति को नियंत्रित करना है।

अपनी ही स्वीकारोक्ति से फंसी सरकार

कोर्ट के सवालों के जवाब में राज्य सरकार ने स्वीकार किया था कि प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से नियुक्त कर्मचारी भी राज्य के नियमों के अनुसार चुने गए थे, उनके पास आवश्यक योग्यता थी और वे सीधे नियुक्त कॉन्ट्रैक्चुअल कर्मचारियों के समान ही काम कर रहे थे। इसी जवाब में सरकार खुद ही फंसी नजर आई। इसके बावजूद सरकार ने उन्हें 2022 के नियमों का लाभ देने से इनकार किया था।

प्रदेशभर के हजारों कॉन्ट्रैक्चुअल कर्मचारियों को मिलेगा फायदा

राजस्थान हाईकोर्ट का यह आदेश 5 अगस्त 2025 को सुनवाई के बाद सुरक्षित रखा गया था और 26 अगस्त 2025 को सुनाया गया। यह फैसला प्रदेश के हजारों कॉन्ट्रैक्चुअल कर्मचारियों को प्रभावित करेगा, जो विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत प्लेसमेंट एजेंसियों के माध्यम से काम कर रहे हैं। न्यायालय ने कहा कि यदि सरकार इन कर्मचारियों को 2022 के नियमों के तहत नहीं लाती है, तो यह शोषण को बढ़ावा देगा और अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानकों का उल्लंघन होगा।

किसकी तरफ से किसने रखा पक्ष

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ताओं में जितेन्द्र सिंह भलेरिया, डॉ. निखिल दुगावत, दिलीप कुमार, पवन सिंह, हर्ष गुप्ता, दीपक जांगिड़, गजेन्द्र सिंह और दीपक पारीक ने पक्ष रखा। वहीं, सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राजेश पंवार, रवींद्र पुरी गोस्वामी, आयुष गहलोत तथा विभिन्न विभागों की ओर से अधिवक्ता दीपक चांडक, सुखदेव शर्मा (AAG बी.एल. भाटी के लिए), मेहाली मेहता (AAG एस.एस. राठौड़ के लिए) अदिति शर्मा (AAG एन.एस. राजपुरोहित के लिए) और AAG महावीर बिश्नोई के साथ हर्षवर्धन सिंह चुंडावत भी कोर्ट में मौजूद रहे।



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