झुंझुनूं के गणेश मंदिर के पास इस बार भी मूर्तिकार बलराम की कार्यशाला आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। यहां मिट्टी से तैयार हो रही गणेश जी की प्रतिमाएं न केवल खूबसूरती में अनोखी हैं, बल्कि पर्यावरण का भी पूरा ध्यान रखकर बनाई जा रही हैं। पिछले 40 साल से गण

मिट्टी से बनाई जा रही गणेश प्रतिमा पर अंतिम नक्काशी करते मूर्तिकार बलराम।
मिट्टी से बनी मूर्तियां, पर्यावरण की रक्षा
मूर्तिकार बलराम, जिन्होंने पिछले चार दशकों से झुंझुनूं में गणेश प्रतिमाएं बनाने की कला को जीवित रखा है, बताते हैं कि वे अपनी मूर्तियों के लिए सोनासर गांव की चिकनी मिट्टी का इस्तेमाल करते हैं। इन मूर्तियों को बनाने के लिए घास-फूस का ढांचा तैयार किया जाता है और उसके ऊपर मिट्टी की परतें चढ़ाई जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में न तो किसी जहरीले रंग का प्रयोग होता है और न ही प्लास्टिक या अन्य हानिकारक सामग्री का।

कार्यशाला में सूखने के लिए रखी गई अलग-अलग आकार की इको-फ्रेंडली गणेश प्रतिमाएं।
बलराम के अनुसार, प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनी मूर्तियां पानी में आसानी से नहीं घुलतीं, जिससे नदियां और तालाब प्रदूषित होते हैं। यही कारण है कि उनकी इको-फ्रेंडली प्रतिमाएं हर साल लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। इस साल उन्होंने 100 से अधिक प्रतिमाएं बनाने का लक्ष्य रखा है, जिनमें 2 फीट से लेकर 13 फीट तक की मूर्तियां शामिल हैं।
राजस्थान से बाहर भी बढ़ी मांग
बलराम की कलाकारी केवल झुंझुनूं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि राजस्थान के बाहर से भी उनकी मूर्तियों की मांग आती है। वे बताते हैं कि छोटी मूर्तियों की कीमत 100 रुपये से शुरू होती है, जबकि बड़ी मूर्तियां 10,000 रुपये तक में बिकती हैं। हर साल गणेश चतुर्थी से पहले ही उनके पास कई ऑर्डर आ जाते हैं।

श्रद्धा और कला का संगम – बलराम द्वारा तैयार की गई आकर्षक गणेश मूर्तियां।
मेहनत और आस्था का संगम
गणेश प्रतिमा बनाना एक कठिन और समय लेने वाला काम है। बलराम सुबह से देर रात तक अपनी कार्यशाला में लगे रहते हैं। एक मूर्ति को पूरी तरह से सूखने में कई दिन लगते हैं। बारिश के मौसम में यह काम और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है, क्योंकि मिट्टी को सूखने में अधिक समय लगता है। इसके बावजूद, वे कहते हैं कि भगवान गणेश की कृपा से वे हर साल सभी ऑर्डर समय पर पूरे कर लेते हैं।
बढ़ती जागरूकता और सकारात्मक बदलाव
पिछले कुछ सालों में, लोगों में पीओपी की मूर्तियों के पर्यावरणीय नुकसान को लेकर जागरूकता बढ़ी है। इसी कारण, झुंझुनूं के कई गणेश मंडलों ने इस साल केवल मिट्टी की मूर्तियां ही स्थापित करने का फैसला किया है। यह बदलाव बलराम जैसे कलाकारों के लिए एक सकारात्मक संकेत है, जिनकी मेहनत और परंपरा को अब लोग अधिक महत्व दे रहे हैं।
बलराम मूल रूप से असम के रहने वाले हैं और कई साल पहले जीविका की तलाश में झुंझुनूं आए थे। आज, उनकी पहचान एक कुशल और पर्यावरण के प्रति जागरूक मूर्तिकार के रूप में पूरे इलाके में है, जो हर साल श्रद्धा और कला के माध्यम से लोगों को भगवान गणेश से जोड़ते हैं।
Discover more from Kuchaman City Directory
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
Comments