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चित्तौड़गढ़ दुर्ग में स्थित चारभुजा नाथ जी का मंदिर यहां के लोगों की गहरी आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। इसके भीतर विराजमान ठाकुर जी की मूर्ति हजारों साल पुरानी मानी जाती है।

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चारभुजा नाथ जी के रूप में विराजित इस प्रतिमा को लेकर दावा किया जाता है कि इनका स्वरूप सांवलिया सेठ जैसा है। मंदिर के वर्तमान पुजारी कमलेश वैष्णव महाराज ने बताया- यह स्थान बहुत ही प्राचीन है। यहां की मूर्तियां मीरा बाई के आगमन से भी पहले एक केलुपोश (झोपड़ीनुमा) मकान में रखी गई थीं।

इस स्थान पर वर्षों तक साधारण रूप में ठाकुर जी की पूजा होती रही। बाद में मेवाड़ के महाराणा शंभू सिंह जी ने इस स्थान के महत्व को समझा और यहां एक स्थायी, पक्के मंदिर का निर्माण करवाया। इसी कारण इस स्थान को “शंभू कुंज” के नाम से भी जाना जाता है।

मंदिर प्रांगण में ही राम जानकी मंदिर भी है।

मंदिर प्रांगण में ही राम जानकी मंदिर भी है।

यहां तीन प्रमुख मंदिर, ठाकुर जी की दो मूर्तियां

मंदिर में तीन प्रमुख मंदिर हैं। सबसे प्राचीन मंदिर में ठाकुर जी की दो मूर्तियां हैं, जिनमें एक बड़ी और एक छोटी है। इन मूर्तियों की स्थापना विधिवत रूप से की गई थी और आज भी इनकी पूजा पारंपरिक तरीके से होती है।

दूसरे मंदिर में भगवान राम और माता सीता की सुंदर मूर्ति विराजमान है, जिसे लोग “राम-जानकी मंदिर” के नाम से जानते हैं। तीसरे मंदिर में राधा-कृष्ण की मनोहारी मूर्ति है। इन सभी मंदिरों में प्रतिदिन पूजा-अर्चना होती है, लेकिन विशेष अवसरों पर जैसे जन्माष्टमी, दीपावली आदि पर यहां विशेष आयोजन होते हैं।

दूसरा मंदिर राधा कृष्ण जी की है

दूसरा मंदिर राधा कृष्ण जी की है

महंत उदय रामदास जी ने शुरू की थी सेवा

मंदिर की परंपरा और सेवा व्यवस्था विक्रम संवत 1475 से चली आ रही है, जब प्रथम महंत उदय रामदास जी महाराज ने यहां ठाकुर जी की सेवा शुरू की थी। तब से लेकर अब तक कई संतों और महंतों ने मंदिर की सेवा की है। साल 2012 तक बंशीधर आचार्य जी मंदिर के 15वें महंत के रूप में सेवा की। अब वर्तमान में कमलेश जी महाराज सेवा कर रहे है। थे। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि महाराणा शंभू सिंह जी ने विक्रम संवत 1924 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार और विकास करवाया था। उसी समय उन्होंने यहां महादेव जी की एक मूर्ति भी स्थापित की थी। इसी कारण यह संपूर्ण स्थान “शंभू कुंज” कहलाने लगा।

वर्तमान में, मंदिर की संपूर्ण व्यवस्था “श्री चारभुजा नाथ मंदिर सार्वजनिक प्रन्यास शंभू कुंज दुर्ग” द्वारा संचालित होती है, जिसकी देखरेख राव नरेंद्र सिंह विजयपुर कर रहे हैं। मंदिर का प्रशासनिक प्रबंधन सुव्यवस्थित है, जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।

संतों के लिए बनाई जगह, यहां गोदान खंभा भी

मंदिर परिसर में एक विशेष संत निवास स्थल हैं, जिन्हें “कोठारिया” कहा जाता है। ये कोठारिया संत जनों के ठहरने के लिए बनी हुई हैं। मंदिर के मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही दाईं ओर भगवान शिव का मंदिर स्थित है, जो इस स्थान की धार्मिक विविधता को दर्शाता है। चबूतरों के निकट ही वह स्थान है जिसे “महल” कहा जाता है, जहां महाराणा के ठहरने की व्यवस्था होती थी। इसके अलावा एक “गोदान खंभा” भी लगा हुआ है, जो धार्मिक दान परंपरा की प्रतीक है।

पूर्व दिशा में बने मंदिर में चारभुजा नाथ जी के एक छोटे रूप – चतुर्भुज श्यामल जी की मूर्ति प्रतिष्ठित है, जो विशेष रूप से भक्तों को आकर्षित करती है।

कृष्ण जन्माष्टमी के दिन इस मंदिर में विशेष उत्सव का आयोजन होता है। सुबह ठाकुर जी का विशेष अभिषेक किया जाता है, उसके बाद उनका शृंगार होता है। दिनभर भजन-कीर्तन, प्रसाद वितरण और सांस्कृतिक आयोजन चलते हैं। रात्रि में ठाकुर जी को झूला झुलाया जाता है।



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