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‘हमने जब पहली बार देखा तो लगा जैसे- मिट्टी में कई सालों से दबा किसी ऊंट या मवेशी का कंकाल है। जब हकीकत पता चली तो हम चौंक गए। ये कोई आम मवेशी की हड्डियां नहीं, करोड़ों साल पुराने मगरमच्छ के कंकाल हैं। ’

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राजस्थान के रेगिस्तान में जहां दूर-दूर तक पानी नजर नहीं आता, मगरमच्छ का कंकाल यहां मिलना हैरान कर रहा है। जैसलमेर से 60 किलोमीटर दूर मेघा गांव में पिछले 7 दिनों से बड़े-बड़े साइंटिस्ट मगरमच्छ के कंकाल का रहस्य जानने पहुंच रहे हैं। यहां डायनासोर युग से भी पहले के 20 करोड़ साल पुराने मगरमच्छ के कंकाल मिले हैं।

दैनिक भास्कर टीम मेघा गांव पहुंची तो चौपाल से लेकर दुकान तक, बच्चों से लेकर बूढ़ों तक इस बात की चर्चा चल रही थी, दुनियाभर से लोग आएंगे, अब यही कंकाल गांव के लिए विकास के दरवाजे खोलेगा। इस कंकाल को हम कहीं ले जाने नहीं देंगे।

पढ़िए मेघा गांव की ये खास रिपोर्ट….

मेघा गांव में यह वही तालाब है, जिसके बड़ा करने के दौरान 20 करोड़ साल पुराना जीवाश्म मिला।

मेघा गांव में यह वही तालाब है, जिसके बड़ा करने के दौरान 20 करोड़ साल पुराना जीवाश्म मिला।

जून महीने में गांव के लोगों ने पहली बार देखा था कंकाल

मेघा गांव में करोड़ों साल पुराने इस जीवाश्म के मिलने की कहानी जून 2025 से शुरू हुई। इस जीवाश्म को सबसे पहले देखने वाले मुकेश पालीवाल इसके मिलने की पूरी कहानी बताई। उन्होंने बताया कि गांव में बड़ा तालाब खोदा जा रहा था।

तालाब के पास ही एक चट्टान है। जून महीने में हुई बारिश के बाद इस पर जमा मिट्टी हट गई थी। दोपहर में काम करने के बाद सभी ग्रामीण उसी चट्टान पर बैठे थे। अचानक किसी चट्टान पर उभरे एक कंकाल पर मेरी नजर गई। मैंने कुछ लोगों को साथ लिया उसके करीब पहुंचा। चर्चा चल पड़ी कौनसे जानवर की हड्डियां हैं? कोई कह रहा था किसी जानवर की हड्डी है, तो किसी ने बताया ​ऊंट या किसी मवेशी का कंकाल होगा। फिर सबने सामान्य किसी जानवर की हड्डी समझा और अपने-अपने काम पर लौट गए।

गांव वालों से मिली जानकारी पर विशेषज्ञों की एक टीम पहुंची और जैसलमेर में डायनोसोर से भी पुराना जीवाश्म मिलने की पुष्टि हुई।

गांव वालों से मिली जानकारी पर विशेषज्ञों की एक टीम पहुंची और जैसलमेर में डायनोसोर से भी पुराना जीवाश्म मिलने की पुष्टि हुई।

मुकेश बताते हैं- मैं रेगिस्तान में डायनासोर के कंकाल या जीवाश्म मिलने की घटनाओं के बारे में पहले भी पढ़ चुका था। करीब डेढ़ महीने तक गांव में उसी जमाने की चर्चाएं चलती रहीं। लेकिन, मुझे जब लगा कि ये कुछ और है तो मैंने 21 अगस्त को फतेहगढ़ एसडीएम भरत राज को बताया। इसके बाद जब टीम यहां पहुंची तो उन्होंने लंबी जांच पड़ताल के बाद बताया- ये उड़ने वाला डायनासोर है। फिर कुछ दिन बाद दोबारा एक साइंटिस्ट की टीम आई, जिसने बताया कि ये उड़ने वाला डायनासोर नहीं, बल्कि उससे भी पुराना करोड़ों साल पुराने मगरमच्छ का जीवाश्म है।

मेघा गांव में जहां जीवाश्म मिला है, उस स्थान को गांव वालों ने पिंजरे से ढक दिया है।

मेघा गांव में जहां जीवाश्म मिला है, उस स्थान को गांव वालों ने पिंजरे से ढक दिया है।

24 घंटे निगरानी, कंकाल को पिंजरे से ढका

मुकेश पालीवाल हमें उस चट्टान के पास लेकर गए जहां जीवाश्म मिला। उस जगह के चारों ओर तारबंदी की गई है। मुकेश ने बताया कि मगरमच्छ का कंकाल मिलने के बाद प्रशासन की तरफ से तालाब के पास वाली जगह को सुरक्षित कर लिया है। इस ताराबंदी में एक पिंजरा लगाया गया है। ताकि कोई जानवर या ​कोई भी व्यक्ति इसे न छेड़े।

इतना ही नहीं ग्रामीण नहीं चाहते कि ये कंकाल गांव से बाहर जाए। ऐसे में ग्रामीण इसकी सिक्योरिटी को लेकर काफी जागरूक हैं। 24 घंटे निगरानी करते हैं ताकि कोई इसे यहां से लेकर नहीं चला जाए या चोरी न हो जाए।

आकल की तरह यहां म्यूजियम बनाने की मांग

मुकेश पालीवाल का कहना है कि इस जगह का संरक्षण होना चाहिए। हमने ताराबंदी को सही करवाया है। इसके साथ ही पिंजरे पर पत्थरों के टुकड़ों को रख दिया है। बार-बार आकर यहां देखते भी हैं कि ​कोई छेड़खानी तो नहीं कर रहा है।

मुकेश ने बताया कि मीण मेहताब सिंह, माधो सिंह, श्याम सिंह और वे खुद बारी–बारी से इसकी देखभाल करते हैं। रात में भी यहां आकर इसे देखा जाता है। ये जैसलमेर ही नहीं बल्कि राजस्थान समेत पूरे भारत के लिए एक बहुत बड़ी खोज है।

ग्रामीणों की मांग है – जिस तरह से आकल गांव में मिले फॉसिल को सुरक्षित किया गया है, वहां आकल वुड फॉसिल पार्क बनाया है। उसी तर्ज पर हमारे गांव में मिले इस जीवाश्म के लिए भी यहां म्यूजियम बनना चाहिए। इसे खोदकर बाहर निकाले और शीशे में बंद करके रखे ताकि लोग ज्यादा से ज्यादा यहां इसको देखने आएं।

ग्रामीण बोले– पहले कोई नहीं आता था, अब सब आ रहे है

कई दिन तक टीमों का गांव में पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक खुश थे कि उनका गांव रातों-रात चर्चा में आ गया। ग्रामीणों का कहना है कि अब इस कंकाल को हम गांव में ही रखेंगे। 300 घरों की आबादी वाले इस गांव को उम्मीद है कि इस कंकाल के मिलने से गांव में पर्यटक आएंगे। विकास होगा और रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

गांव के महताब सिंह ने बताते हैं– गांव में जब से ये जीव का कंकाल (जीवाश्म) मिला है, तब से बहुत सारे लोग इसे देखने के लिए आ रहे हैं। पहले कोई नहीं आता था। अभी सभी लोग पशुपालन और खेती करके अपना जीवन यापन करते हैं। लोगों के आने से इस जीवाश्म की वजह से ग्रामीणों को रोजगार मिलेगा। हम चाहते हैं कि किताबों में भी इस गांव का जिक्र हो। लोग पढ़े और यहां इसको देखने आए। उम्मीद है- यहां टूरिस्ट आएंगे तो रोजगार भी बढ़ेगा।

बच्चे बोले– किताबों में पढ़ा था, अब कंकाल देखा

मेघा गांव के सवाई सिंह 8वीं क्लास में पढ़ते हैं। कहते हैं- जब गांव में नए–नए लोगों को आते हुए देखता हूं तो बड़ी खुशी होती है। हम स्कूल में भी यही बात करते हैं कि गांव में डायनासोर का कंकाल मिला है। हमने किताबों में पढ़ा था कि ऐसा जानवर भी होता था। अब डायनासोर का युग खत्म हो चुका है। उनसे जुड़ी कोई चीज देखी नहीं थी। अब इसका कंकाल देखा तो विश्वास ही नहीं हो रहा कि हमारे गांव में कभी ऐसे जीव रहते थे।

दानसिंह ने बताया– हमने पहले कभी ऐसा नहीं देखा था। गांव के मुकेश पालीवाल ने ही पूरे गांव को इसकी जानकारी दी। इसके बाद हम सभी उस चट्टान पर जाकर वो हड्डियां देखकर आए थे। हमें तो यही लगा था कि यहां बरसों पहले कहीं ऊंट मरा होगा, जिसकी हड्डियां रेत में दब गई होंगी। अब बड़े-बड़े साइंटिस्ट आकर बता रहे हैं- करोड़ों साल पुराने मगरमच्छ के अवशेष हैं।

भास्कर रिपोर्टर सिकंदर शेख मौके पर पहुंचे। ग्रामीणों ने बताया कि वे जीवाश्म को एक संरक्षित धरोहर बनाना चाहते हैं।

भास्कर रिपोर्टर सिकंदर शेख मौके पर पहुंचे। ग्रामीणों ने बताया कि वे जीवाश्म को एक संरक्षित धरोहर बनाना चाहते हैं।

इस खोज को लेकर दो बड़े दावे

भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी खोज: जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया इस पर खोज करेगा। दावा है कि भारतीय इतिहास में यह बहुत बड़ी खोज है। यहां और भी जीवाश्म मिलने की संभावना है, जहां खुदाई की जाएगी।

डॉ. एन. डी इणखिया ने बताया कि संभावना जताई जा रही है कि यह जीव अपने अंडे की सुरक्षा कर रहा था। ये जीव नदी या समुद्र के किनारे पाए जाते थे और इन्हें शिकारी जीव भी कहा जाता है।

201 मिलियन साल पुराना: जिले के वरिष्ठ भूजल वैज्ञानिक डॉ एनडी इणखिया ने इसे जुरासिक काल का फॉसिल होने की बात कही।

– इसके बाद विशेषज्ञ के रूप मे डॉ. परिहार ने निरीक्षण कर फॉसिल की पुष्टि की। डॉ. परिहार ने इसे 201 मिलियन वर्ष (करीब 20 करोड़ साल) पुराना घने जंगलों में पाए जाने वाले वृक्ष छिपकली (फाइटोसौर) मगरमच्छ प्रजाति का जीवाश्म बताया।

– इसकी लंबाई 1.5 से 2 मीटर है। रिसर्च में सामने आया कि फाइटोसौर (वृक्ष छिपकली) एक प्राचीन सरीसृप है, जो नदियों के पास जंगलों में रहता था।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फाइटोसौर (वृक्ष छिपकली) का जीवाश्म है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फाइटोसौर (वृक्ष छिपकली) का जीवाश्म है।

डायनासोर से भी पुराना है जीव

ट्राइऐसिक पीरियड 251.9 से 201.4 मिलियन वर्ष पहले तक चला था। यह पीरियड पर्मियन- ट्राइऐसिक विलुप्ति के बाद शुरू हुआ। इसमें धरती पर जीवन की भारी क्षति हुई थी। इसी दौर में डायनासोर, कछुए, छिपकली समेत विभिन्न स्तनधारी जीव पैदा हुए थे। इस दौर में पेंजिया नामक एक ही महाद्वीप था, और विभिन्न प्रकार के जीव, विशेष रूप से सरीसृपों की उत्पत्ति हुई थी।

गांव वालों ने जीवाश्म को पिंजरे से सुरक्षित रखने का फैसला किया है। इसके लिए विशेष आकार में पिंजरा बनाया है और निगरानी भी कर रहे हैं।

गांव वालों ने जीवाश्म को पिंजरे से सुरक्षित रखने का फैसला किया है। इसके लिए विशेष आकार में पिंजरा बनाया है और निगरानी भी कर रहे हैं।

20 करोड़ साल पुराना है जीवाश्म

यह जिस जीव के जीवाश्म है वह प्रजाति 20 करोड़ साल पहले ही विलुप्त हो चुकी थी। यानी जुरासिक काल से पहले लेट ट्राइऐसिक काल। यह समय वह था जब जुरासिक काल की शुरुआत हो रही थी। जेएनवीयू जोधपुर के भूविज्ञान विभाग के डीन डॉ. वी.एस. परिहार के नेतृत्व में एक टीम ने रविवार को मेघा गांव में मिले जीवाश्म की जांच कर अध्ययन किया।

इस दौरान सामने आया कि यह फाइटोसौर (छिपकली की प्रजाति) का कंकाल है। यह जीव पानी के आसपास रहता था। इसकी आकृति मगरमच्छ से मिलती जुलती है। लेकिन यह डायनासोर नहीं है। डॉ. परिहार के अनुसार यह करीब 20 करोड़ साल पुराने जीवाश्म हैं। इसकी लम्बाई डेढ़ से दो मीटर है।

भू जल वैज्ञानिक डॉ. एन.डी. इणखिया ने बताया शुरूआती अध्ययन किया तो यह जुरासिक काल के समय के आस–पास के जीवाश्म होना सामने आया था। जांच की तो सामने आया कि यह जीवाश्म ट्राइऐसिक काल के हैं।गौरतलब है कि यह काल 252 से 201 मिलियन साल पुराना है। लेट टाइऐसिक काल में धरती पर ये जीव विलुप्त हो चुके थे, उसके बाद जुरासिक काल की शुरुआत हुई थी।



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